उप्र : गंगा नदी में नाव पर बिरयानी खाने वाले आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

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उप्र : गंगा नदी में नाव पर बिरयानी खाने वाले आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

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  • Publish Date - March 23, 2026 / 09:35 PM IST,
    Updated On - March 23, 2026 / 09:35 PM IST

वाराणसी (उप्र), 23 मार्च (भाषा) वाराणसी की एक अदालत ने गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी करने और चिकन बिरयानी खाने के मामले में 14 आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज कर दी।

वादी पक्ष के अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने बताया कि अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अमित कुमार यादव ने 14 आरोपियों की जमानत सोमवार को खारिज कर दी।

अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर और गैर जमानती हैं, इसलिए इस समय जमानत देने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।

त्रिपाठी ने बताया कि आरोपियों पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने, सार्वजनिक उपद्रव, जल प्रदूषण सहित कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया। बाद में पुलिस ने जबरन नाव लेने की धारा भी प्राथमिकी में जोड़ी।

उन्होंने बताया कि सभी 14 आरोपी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं। सभी को अदालत ने इस महीने के 19 तारीख को 14 दिन के न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। आरोपियों के परिजनों ने 19 तारीख को जमानत अर्जी दाखिल की थी।

वादी पक्ष के अधिवक्ताओं ने न्यायालय को अवगत कराया कि प्रकरण में दर्ज प्राथमिकी, केस डायरी तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की संलिप्तता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। साथ ही, यह भी रेखांकित किया कि मामले की जांच अभी जारी है और ऐसे में आरोपियों को जमानत देना न्यायहित में नहीं होगा।

वहीं, अभियोजन पक्ष द्वारा भी जमानत प्रार्थना पत्र का कड़ा विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपियों द्वारा किया गया अपराध गंभीर प्रकृति का है, जिसमें कठोर दंड का प्रावधान है। अभियोजन ने दलील दी कि यदि आरोपियों को जमानत दी जाती है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

अदालत ने वादी और अभियोजन पक्षों की दलीलों को सुनने एवं उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करने के उपरांत यह पाया कि मामले के तथ्य एवं परिस्थितियां जमानत प्रदान करने के अनुकूल नहीं हैं। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आरोपियों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप स्थापित होते हैं तथा जांच की वर्तमान स्थिति के मद्देनजर जमानत का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता।

अदालत ने अंततः सभी आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रकरण की गंभीरता एवं उपलब्ध साक्ष्यों को दृष्टिगत रखते हुए यह निर्णय न्यायोचित है।

भाषा सं राजेंद्र धीरज

धीरज