लखनऊ, 15 सितंबर (भाषा) बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती द्वारा अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से ‘‘पूरी तरह मुक्त’’ किए जाने के बाद 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले युवा दलित नेता को अपने पाले में लाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
समाजवादी पार्टी (सपा), आजाद समाज पार्टी (कांशीराम), निषाद पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) और कांग्रेस ने आनंद को अपने साथ जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अभी तक उन्हें कोई खुला प्रस्ताव नहीं दिया है लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दल निषाद पार्टी और आरपीआई ने 31 वर्षीय आनंद को अपनी पार्टियों में आने का न्योता दिया है।
सपा ने भी आनंद को पार्टी में शामिल करने की संभावना से इनकार नहीं किया जबकि आजाद समाज पार्टी ने उन्हें स्पष्ट प्रस्ताव दिया है।
आम आदमी पार्टी और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने इस मामले पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
लंदन से पढ़ाई कर चुके और बसपा के पूर्व राष्ट्रीय समन्वयक आनंद को पार्टी के युवा चेहरे के रूप में पेश किया गया था।
उन्होंने चुनाव प्रचार और सोशल मीडिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
आनंद के बसपा से बाहर होने के बाद उन दलों में हलचल बढ़ गई है, जो 2027 के चुनाव से पहले युवा दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार मजबूत करना चाहते हैं।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल में आनंद को पार्टी में शामिल करने की संभावना के संकेत दिए थे।
एक संवाददाता सम्मेलन में जब उनसे पूछा गया कि क्या सपा आनंद को अपने साथ लेगी, तो यादव ने कहा, ‘‘आप ले आइए, हम ले लेंगे।’’
उन्होंने हालांकि कहा कि आनंद को पार्टी से हटाना बसपा का आंतरिक मामला है और अन्य दलों को इस पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि जो भी अखिलेश यादव के नेतृत्व और पार्टी की विचारधारा में विश्वास रखता है, उसका स्वागत है।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आनंद को अपनी पार्टी में शामिल होन का न्योता दिया।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने पहले बसपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी लेकिन उस समय उनके नेताओं को बातचीत के योग्य नहीं समझा गया।
निषाद पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार के मत्स्य मंत्री संजय निषाद ने भी आनंद को अपनी पार्टी में शामिल होने का सार्वजनिक प्रस्ताव दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘जो युवा बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के सपनों को आगे बढ़ाना चाहते हैं, उनका हमारी पार्टी में स्वागत है।’’
निषाद ने आनंद से विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए उनकी पार्टी से जुड़ने की अपील की और कहा कि वह मंत्रिमंडल में अपनी पसंद का पद ले सकते हैं तथा अपनी टीम के साथ काम कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या वह दूसरे दल के नेता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, निषाद ने कहा, ‘‘हम तोड़ नहीं रहे, जोड़ रहे हैं।’’
केंद्रीय मंत्री और आरपीआई प्रमुख रामदास आठवले ने भी मुरादाबाद में एक कार्यक्रम में आनंद को अपनी पार्टी में शामिल होने का सीधा न्योता दिया।
उन्होंने कहा कि आनंद बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायी हैं और अगर वह चाहें तो आरपीआई में शामिल हो सकते हैं।
आठवले ने बाद में कहा कि आरपीआई उत्तर प्रदेश में अपना विस्तार करना चाहती है और 2027 के विधानसभा चुनाव में आठ से 10 सीट पर चुनाव लड़ने की योजना है।
उन्होंने कहा कि बसपा के साथ गठबंधन संभव नहीं है क्योंकि उनकी पार्टी पहले से भाजपा के साथ है।
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आनंद को ‘‘अच्छा, संस्कारी, समझदार और बुद्धिमान युवा’’ बताया।
कांग्रेस नेता उदित राज ने भी दिल्ली में कहा कि आनंद का उनकी पार्टी में स्वागत है।
आनंद के राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए हैं।
वह पहली बार 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान मायावती के साथ चुनावी रैलियों में नजर आए थे।
वर्ष 2019 में उन्हें बसपा का राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और दिसंबर 2023 में मायावती का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक विवादित भाषण के बाद मई 2024 में उन्हें सभी पदों से हटा दिया गया था, हालांकि बाद में उन्हें बहाल कर दिया गया।
मार्च 2025 में उन्हें फिर जिम्मेदारियों से हटाया गया और अप्रैल 2025 में दोबारा राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया।
मौजूदा संकट की शुरुआत दो अगस्त को उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ को बसपा से निष्कासित किए जाने के बाद हुई।
मायावती ने इसके बाद तीन सितंबर को आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक समेत अन्य प्रमुख पदों से हटा दिया।
उन्होंने 11 सितंबर को आनंद को पार्टी से ‘‘पूरी तरह मुक्त’’ करने की घोषणा की।
मायावती ने दोनों पर बसपा व बहुजन आंदोलन से अधिक निजी और पारिवारिक हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया।
आनंद की ओर से अब तक उन्हें मिले राजनीतिक प्रस्तावों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भाषा किशोर मनीष आनन्द जितेंद्र
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