बांग्लादेश: जनमत संग्रह में ‘हां’ की जीत संवैधानिक निरंतरता को कर सकती बाधित : विशेषज्ञ

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बांग्लादेश: जनमत संग्रह में ‘हां’ की जीत संवैधानिक निरंतरता को कर सकती बाधित : विशेषज्ञ

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  • Publish Date - February 12, 2026 / 07:06 PM IST,
    Updated On - February 12, 2026 / 07:06 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

ढाका,12 फरवरी (भाषा) बांग्लादेश की मुहम्मद यूनुस नीत अंतरिम सरकार की ओर से जटिल सुधार के लिए कराए जा रहे जनमत संग्रह को जनता की सहमति मिलने की स्थिति में मूलभूत इतिहास खतरे में पड़ सकता है और 1972 में लागू संविधान की निरंतरता बाधित हो सकती है। विशेषज्ञों ने बृहस्पतिवार को यह चेतावनी दी।

इस जनमत संग्रह के माध्यम से ‘जुलाई राष्ट्रीय घोषणापत्र 2025’ नामक सुधार प्रस्तावों के लिए लोगों की सहमति मांगी जा रही है, जिसकी घोषणा यूनुस ने 17 अक्टूबर को राजनीतिक दलों और उनके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय सहमति आयोग के बीच लंबे परामर्श के बाद की थी।

जनमत संग्रह के मतपत्र में ‘जुलाई घोषणापत्र’ के चार प्रमुख सुधार क्षेत्रों को शामिल करने वाला एक ही प्रश्न है और मतदाताओं से अपील की गई है कि यदि वे प्रस्तावों से दृढ़ता से सहमत हैं तो ‘हां’ और यदि वे असहमत हैं तो ‘नहीं’ में वोट दें।

राजनीतिक विश्लेषक और नाटककार इराज़ अहमद ने कहा, ‘‘बृहस्पतिवार को हो रहे आम चुनाव के साथ-साथ आयोजित जनमत संग्रह में सामने आए प्रस्ताव काफी हद तक गूढ़ प्रतीत होते हैं।’’

उन्होंने कहा कि अधिकतर मतदाता 84 सूत्रीय सुधार पैकेज के बारे में ‘अनभिज्ञ’ हैं, जिसे जनमत संग्रह पत्र में चार प्रश्नों के माध्यम से संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत किया गया है।

इराज ने कहा, ‘‘अगर यह पारित हो जाता है, तो बांग्लादेश की लगभग 55 वर्षों की संवैधानिक निरंतरता वस्तुतः समाप्त हो जाएगी।’’

बांग्लादेश का संविधान 1972 में लागू हुआ था और अब तक इसमें 17 बार संशोधन किया जा चुका है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस बार, यूनुस द्वारा वादा किए गए नए बांग्लादेश के निर्माण के लिए बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों और ‘निस्तारित हो चुके मुद्दों’ को पलटने के लिए कई प्रस्ताव पेश किए गए हैं।

प्रख्यात अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ तानिया अमीर ने कहा कि जनमत संग्रह और संवैधानिक सुधार बांग्लादेश के मूलभूत इतिहास और कानूनी विरासत के लिए खतरा हैं। उन्होंने कहा कि ये वस्तुतः ‘‘हमारे इतिहास को निष्फल’’ कर रहे हैं और बांग्लादेश की 1971 की स्वतंत्रता की कानूनी नींव को काफी हद तक कमतर कर रहे हैं।

प्रख्यात न्यायविद और वकील स्वाधीन मलिक ने कहा, ‘‘1972 का संविधान बांग्लादेश की कानूनी रीढ़ है। इसे रद्द करने का प्रयास बांग्लादेश के एक राज्य के रूप में अस्तित्व के कानूनी आधार पर ही सवाल उठाने जैसा है।’’

यूनुस ने नौ फरवरी को राष्ट्रव्यापी संबोधन में जनमत संग्रह में अपने प्रस्तावित सुधार पैकेज के लिए ‘हां’ के पक्ष में मतदान करने का आह्वान किया था।

हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहसिन रशीद सहित कई न्यायविदों ने जनमत संग्रह की वैधता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि बांग्लादेश के संविधान में इस तरह के जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है, जबकि सरकार ने राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन से प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करवाए और बाद में एक आधिकारिक राजपत्र जारी किया।

विदेश संबंध विशेषज्ञ और पूर्व राजदूत महफूजुर रहमान जैसे विश्लेषकों ने कहा कि 84 बिंदुओं को मान्यता देने वाले चार मुद्दों को मतदाताओं के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है। उनका कहना है कि मतदाताओं को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि यदि वे ‘हां’ में वोट देते हैं तो क्या बदलाव होंगे और यदि ‘नहीं’ में वोट देते हैं तो कौन से बदलाव नहीं होंगे।

कानून के प्रोफेसर मलिक और अन्य आलोचकों ने कहा कि चुनाव में ‘हां/ना’ के आधार पर मतदान करने से मतदाताओं के लिए कई जटिल सुधारों वाले संविधान पर अपना निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है और यहां तक ​​कि जानकार मतदाता भी कुछ परिवर्तनों का समर्थन कर सकते हैं लेकिन दूसरों का विरोध कर सकते हैं।

मलिक ने कहा, ‘‘जुलाई घोषणापत्र में लिए गए अधिकतर निर्णय, जिनमें राजपत्र में प्रकाशित निर्णय भी शामिल हैं, वर्तमान संविधान के विपरीत हैं।’’

उन्होंने कहा कि चूंकि संविधान अब भी लागू है, इसलिए राष्ट्रपति कानूनी रूप से इस राजपत्र पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते हैं, और यह तब स्वीकार्य हो सकता था जब संविधान को रद्द कर दिया गया होता या मार्शल लॉ के तहत निलंबित कर दिया गया होता।

विधि के एक अन्य प्रोफेसर एस.एम. मासूम बिल्लाह ने कहा कि जुलाई घोषणापत्र में उल्लिखित 84 सुधार प्रस्तावों में से 47 संवैधानिक संशोधन हैं, जबकि 37 को सामान्य कानून या कार्यकारी आदेशों के माध्यम से लागू किया जाना है।

सरकार ने शुरू में कहा था कि यदि किसी राजनीतिक दल की कुछ प्रस्तावों पर असहमति हो, तो सत्ता में आने पर वह दल उन प्रस्तावों को लागू करने के लिए बाध्य नहीं होगा। लेकिन इस मुद्दे पर कोई समाधान न निकल पाने के बाद, सरकार ने अंततः जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया।

बैरिस्टर आमिर ने कहा, ‘‘अगर जनमत संग्रह में ‘हां’ की जीत होती है, तो अगली संसद बांग्लादेश की एकात्मक राजनीतिक प्रणाली में मौजूदा एक विधायिका के बजाय द्विसदनीय संसद की स्थापना सहित सुधार पैकेज को लागू करने के लिए बाध्य होगी।’’

उन्होंने सवाल किया कि सरकार ने जिस संविधान की शपथ ली थी, तब उस संविधान में ऐसे जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं था, तो एक ‘संप्रभु संसद’ अंतरिम सरकार की इच्छा को लागू करने के लिए कैसे बाध्य हो सकती है?

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल