कार्यस्थल पर ‘जेन जी’ के संवाद करने का तरीका अलग होने के बावजूद वरिष्ठ सहकर्मी उन्हें समझ सकते हैं

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कार्यस्थल पर ‘जेन जी’ के संवाद करने का तरीका अलग होने के बावजूद वरिष्ठ सहकर्मी उन्हें समझ सकते हैं

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  • Publish Date - September 26, 2026 / 06:10 PM IST,
    Updated On - September 26, 2026 / 06:10 PM IST

(जेफ लेब्लांक, बोस्टन यूनिवर्सिटी)

बोस्टन, 26 सितंबर (द कन्वरसेशन) कार्यस्थल पर पीढ़ियों के बीच अंतर को लेकर भले ही काफी चर्चा होती हो, लेकिन इनमें से कुछ सबसे बड़े अंतर बेहद सामान्य और रोजमर्रा के पलों में नजर आते हैं।

कार्यस्थल पर देर से पहुंचने की बात ही ले लीजिए। मैंने 20 वर्षीय एक ‘जेन जी’ कर्मचारी से बात की, जो स्थानीय स्तर पर संचालित एक छोटे कैफे और रेस्तरां में काम करती है। इस कैफे और रेस्तरां का संचालन एक उम्रदराज ‘जेन एक्स’ मालिक करता है।

जब एक दिन उसे ऐसा लगा कि वह कार्यस्थल देर से पहुंचने वाली है, तो उसने कैफे मालिक को संदेश भेज दिया। कैफे मालिक इससे नाराज हो गया। उसके लिए देर से आना एक गंभीर मामला था और वह चाहता था कि इसके लिए फोन करना जरूरी था क्योंकि संदेश भेजना कैफे मालिक को बहुत अनौपचारिक लगा।

कर्मचारी ने इसी मामले को बिल्कुल अलग नजरिए से देखा।

उसने मुझे बताया, ‘‘वह (कैफे मालिक) बहुत व्यस्त रहते हैं, इसलिए मुझे लगा कि फोन करने से उनका ज्यादा समय लगेगा। इसलिए मैंने संदेश भेज दिया। मुझे लगा कि यह ज्यादा विचारशील तरीका है।’’

दोनों को लगता था कि वे जानते हैं कि कार्यस्थल पर सम्मानजनक संचार कैसा होना चाहिए। लेकिन इसके लिए दोनों की परिभाषा बिल्कुल अलग थी।

मैं कार्यस्थल की संस्कृति और संवाद का अध्ययन करता हूं और पाता हूं कि ऐसे कार्यस्थलों में इस तरह की गलतफहमियां लगातार बढ़ती जा रही हैं जहां अलग-अलग पीढ़ियों के लोग साथ काम करते हैं।

और यह अंतर तब और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है, जब ‘जेन जी’ के लोग तेजी से कार्यबल का हिस्सा बन रहे हैं। ‘जेन जी’ के सबसे उम्रदराज सदस्य अब 30 साल के करीब पहुंच रहे हैं, जबकि सबसे कम उम्र के सदस्य कॉलेज और हाई स्कूल में हैं।

‘जेन जी’ वे युवा हैं जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है।

‘जेन जी’ के उम्रदराज सदस्यों की खास बात यह है कि उनमें से कई लोगों ने कोविड-19 महामारी के दौरान कॉलेज की पढ़ाई, इंटर्नशिप या अपनी पहली नौकरी शुरू की, जब हमारे संवाद का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन हो गया था और मास्क के कारण अक्सर हमारे चेहरे का आधा हिस्सा ढका रहता था। अब इसमें एक नया बदलाव भी जुड़ गया है, क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हमारे संवाद करने के तरीके को एक बार फिर बदल रही है।

नतीजा यह जरूरी नहीं है कि ‘जेन जी’ के कर्मचारी अपने बॉस और सहकर्मियों के साथ पिछली पीढ़ियों की तुलना में बेहतर या खराब संवाद करते हैं। मेरा तर्क है कि उन्होंने बस एक बिल्कुल अलग माहौल में संवाद करना सीखा है।

कैफे वाला उदाहरण आसानी से यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि युवा कर्मचारी संदेश भेजना पसंद करते हैं और उन्हें लगता है कि फोन पर बात केवल महत्वपूर्ण अवसरों पर ही की जानी चाहिए।

इसके विपरीत, उसके बॉस के लिए फोन पर बात करने का अपना एक अलग महत्व था। इससे यह संदेश जाता था कि वह देर से आने की गंभीरता को समझती है।

दोनों में से किसी ने भी अपनी इस अपेक्षा के बारे में एक-दूसरे को नहीं बताया था।

प्रबंधकों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि कर्मचारी भी किसी खास तरह के संवाद को वही अर्थ देते हैं, जो वे देते हैं। अगर देर से आने की स्थिति में फोन करना जरूरी है, तो उन्हें यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए।

मैंने एक और ‘जेन जी’ कर्मचारी से बात की, जिसने हाल में न्यू इंग्लैंड की एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वह गंभीर चिंता से जूझ रहा था और उसने अपने प्रबंधक को इस बारे में बताने का फैसला किया। प्रबंधक ने सहानुभूति दिखाई, लेकिन वह असहज भी महसूस कर रहे थे।

प्रबंधक ने मुझे बताया, ‘‘अगर मैं ईमानदारी से कहूं तो इससे मुझे असहज महसूस हुआ। मैं उसकी चिंता को कमतर नहीं आंकना चाहता था, लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि मेरे लिए यह जानना जरूरी था।’’

यह अंतर महत्वपूर्ण है। उनकी प्रतिक्रिया यह नहीं थी कि चिंता वास्तविक नहीं है या उनके कर्मचारी को बस इससे उबर जाना चाहिए। बल्कि, उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि उनके पेशेवर रवैये में इस तरह की बातों की कितनी जगह होनी चाहिए।

कई उम्रदराज कर्मचारियों ने सीखा है कि पेशेवर रवैया अपनाने का मतलब निजी और कामकाजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करना होता है। वहीं, ‘जेन जी’ के सदस्य ऐसे समय में बड़े हो रहे हैं, जब मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत कल्याण से जुड़ी बातचीत काफी अधिक सार्वजनिक हो गई है। जो बात एक व्यक्ति को उचित लगती है, वही उसके बॉस को जरूरत से ज्यादा निजी जानकारी साझा करना लग सकती है।

इसका यह मतलब नहीं है कि प्रबंधकों को ‘थेरेपिस्ट’ बनना होगा और कर्मचारियों को भी अपनी जिंदगी में चल रही हर बात बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन दोनों को यह समझने की जरूरत हो सकती है कि निजी बातें साझा करने को लेकर उनकी सहजता का स्तर सभी के लिए एक जैसा नहीं होता।

मेरा मानना है कि अलग-अलग पीढ़ियों के साथ मिलकर काम करने के लिए यही सबसे बड़ा सबक हो सकता है।

‘जेन जी’ इन्हें एक बिल्कुल अलग दुनिया में सीख रही है।

(द कन्वरसेशन)

देवेंद्र पवनेश

पवनेश