ब्रिटेन: भारतीय मूल की स्वास्थ्यकर्मी ने ‘आंटी’ कहे जाने के विवाद में उत्पीड़न का मुकदमा जीता

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ब्रिटेन: भारतीय मूल की स्वास्थ्यकर्मी ने 'आंटी' कहे जाने के विवाद में उत्पीड़न का मुकदमा जीता

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  • Publish Date - April 8, 2026 / 05:04 PM IST,
    Updated On - April 8, 2026 / 05:04 PM IST

(अदिति खन्ना)

लंदन, आठ अप्रैल (भाषा) ब्रिटेन की ‘नेशनल हेल्थ सर्विस’ (एनएचएस) में कार्यरत भारतीय मूल की एक स्वास्थ्य सहायिका ने घाना मूल के एक नर्स सहकर्मी द्वारा उन्हें बार-बार ‘आंटी’ कहे जाने के खिलाफ उत्पीड़न का मामला जीत लिया है।

‘वाटफोर्ड एम्प्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल’ न्यायाधीश जॉर्ज एलियट ने माना कि इल्डा एस्टेव्स को उम्र और लिंग के आधार पर परेशान किया गया था। उन्होंने वेस्ट लंदन एनएचएस ट्रस्ट को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता की ‘‘भावनाएं आहत किये जाने’’ के लिए कुल 1,425.15 पाउंड का हर्जाना दे।

पिछले साल इस मामले की सुनवाई पूरी करने वाले और पिछले माह फैसला सुनाने वाले तीन-सदस्यीय पीठ ने कहा कि घाना की संस्कृति में ‘‘आंटी’’ शब्द बुजुर्गों के लिए सम्मान का प्रतीक है। हालांकि, वार्ड में टीम का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी स्टाफ नर्स चार्ल्स ओप्पोंग की थी और उन्हें ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी।

फैसले में कहा गया, ‘‘हमें लगता है कि चार्ल्स ओप्पोंग का उद्देश्य संभवतः हास्य का एक आपत्तिजनक प्रयास था।’’

इसमें कहा गया, ‘‘हमने पाया कि शिकायतकर्ता ने इसे आपत्तिजनक माहौल बनाने के रूप में महसूस किया। हमने पाया कि कार्यालय और गलियारों में तथा कार्यभार सौंपते समय की गई टिप्पणियां ऐसी थीं कि उनसे आपत्तिजनक माहौल पैदा हुआ। हमने पाया कि टिप्पणियों का ऐसा प्रभाव होना उचित था। इसलिए, इस आधार पर शिकायतकर्ता का उत्पीड़न का दावा सही साबित होता है।’’

भारतीय मूल की 61-वर्षीय स्वास्थ्यकर्मी एस्टेव्स ने न्यायाधिकरण के समक्ष गवाही दी कि ओप्पोंग ने कई मौकों पर उन्हें ‘आंटी’ कहकर पुकारा, जबकि उन्होंने बार-बार अपना पहला नाम लेकर संबोधित करने का अनुरोध किया था।

उसने यह भी बताया कि जॉर्ज नामक उसके वरिष्ठ सहकर्मी के साथ उसके संबंधों को लेकर दो बार अनुचित टिप्पणी की गई।

कहा जा रहा है कि ये घटनाएं जून और सितंबर 2023 के बीच संक्षिप्त अवधि में हुई थीं। इस मामले में शिकायतकर्ता ने उनकी पहचान बताए बगैर आदेश जारी करने का अनुरोध किया था, जिसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि ‘‘न्याय की मुक्त प्रशासनिक प्रक्रिया में सार्वजनिक हित किसी भी दावेदार के संवैधानिक अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं’’।

अदालत ने, हालांकि शिकायतकर्ता के उत्पीड़न के अन्य दावों को भी खारिज कर दिया, जिनमें जाति, भेदभाव, प्रतिशोध और वेतन की अनधिकृत कटौती शामिल थे।

भाषा शुभम सुरेश

सुरेश