Mojtaba Khamenei news/ image source: WIKIPEDIA
Iran New Supreme leader: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान की सत्ता को लेकर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल की ओर से किए गए सैन्य हमले के बाद यह खबर सामने आई कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी बीच देश में नए सुप्रीम लीडर को लेकर संभावित नामों पर भी चर्चा शुरू हो गई है। इन नामों में सबसे ज्यादा जिस शख्स का जिक्र किया जा रहा है, वह हैं खामेनेई के बेटे मोज्तबा खामेनेई।
Iran New Supreme leader मामले में रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ ताकतवर धार्मिक और सुरक्षा प्रतिष्ठानों के भीतर मोज्तबा खामेनेई को उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कुछ प्रभावशाली धड़ों का समर्थन उन्हें मिल सकता है। हालांकि इस विषय पर ईरान के आधिकारिक संस्थानों की ओर से अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। बताया जा रहा है कि हमले के दौरान मोज्तबा खामेनेई उस स्थान पर मौजूद नहीं थे, जिससे वे सुरक्षित बच गए, जबकि उनके परिवार के कुछ सदस्य इस हमले की चपेट में आ गए।
दिलचस्प बात यह है कि मोज्तबा खामेनेई कभी भी सीधे चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं रहे हैं। उन्होंने न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक अभियान चलाया, लेकिन इसके बावजूद सत्ता के गलियारों में उनका प्रभाव लंबे समय से माना जाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रीम लीडर के करीबी नेटवर्क और सुरक्षा प्रतिष्ठान के साथ उनके संबंधों ने उन्हें पर्दे के पीछे एक प्रभावशाली शख्स बना दिया है। पिछले कई वर्षों से उन्हें अपने पिता के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जाता रहा है।
हालांकि उनकी धार्मिक योग्यता को लेकर बहस भी कम नहीं है। मोज्तबा खामेनेई के पास ‘होजातोलेस्लाम’ की पदवी है, जो शिया धार्मिक पदक्रम में ‘आयतुल्लाह’ से नीचे मानी जाती है। कुछ धार्मिक विद्वान मानते हैं कि सर्वोच्च पद पर बैठने वाले व्यक्ति का उच्च धार्मिक दर्जा होना चाहिए, हालांकि कानूनी तौर पर यह अनिवार्य नहीं है। दरअसल 1989 में ईरान के संविधान में संशोधन के बाद यह शर्त हटा दी गई थी कि सुप्रीम लीडर के लिए ‘ग्रैंड आयतुल्लाह’ होना जरूरी हो। इसी बदलाव के बाद अली खामेनेई को भी इस पद तक पहुंचने का रास्ता मिला था।
ईरान के संविधान के अनुसार सुप्रीम लीडर बनने के लिए व्यक्ति का न्यायप्रिय होना, इस्लामी कानून की गहरी समझ रखना और राजनीतिक-प्रशासनिक क्षमता से लैस होना आवश्यक है। साथ ही उसे समय की परिस्थितियों को समझने वाला और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से मजबूत नेता माना जाता है। यही वजह है कि अक्सर इस पद के लिए उच्च धार्मिक विद्वानों को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि उन्हें धार्मिक और राजनीतिक दोनों तरह की वैधता मिल सके।
मोज्तबा खामेनेई ने सार्वजनिक जीवन में हमेशा लो-प्रोफाइल बनाए रखा है। वे शायद ही कभी बड़े मंचों पर भाषण देते दिखाई दिए हों। यहां तक कि कई ईरानी नागरिकों ने उनकी आवाज भी शायद ही सुनी हो। इसके बावजूद पिछले दो दशकों में उनका नाम कई राजनीतिक विवादों से भी जुड़ा रहा है। कुछ सुधारवादी नेताओं और विपक्षी समूहों ने उन पर 2009 के ग्रीन मूवमेंट के दौरान प्रदर्शनकारियों पर सख्ती बरतने में सुरक्षा बलों की भूमिका को प्रभावित करने के आरोप लगाए थे, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई।
सुरक्षा प्रतिष्ठान के साथ उनके रिश्ते भी लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। कहा जाता है कि उन्होंने अपने शुरुआती दौर में ही IRGC के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों से करीबी संबंध बना लिए थे। इसके अलावा पश्चिमी मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया है कि उनके प्रभाव के जरिए कई आर्थिक नेटवर्क और संस्थाओं से जुड़े बड़े वित्तीय लेनदेन हुए हैं, हालांकि इन दावों को लेकर स्पष्ट प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।
फिलहाल ईरान में सत्ता का मामला संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा। देश की 88 सदस्यीय धार्मिक संस्था ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ को ही नए सुप्रीम लीडर का चयन करने का अधिकार है। मौजूदा हालात में देश में इंटरनेट बंद होने और लगातार सैन्य तनाव की स्थिति के कारण जानकारी सीमित रूप से ही सामने आ रही है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि ईरान की सत्ता की कमान आखिर किसके हाथों में जाएगी और इसका क्षेत्रीय तथा वैश्विक राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।