इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मोबाइल फोन से मस्तिष्क कैसर होता है: नया अध्ययन

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इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मोबाइल फोन से मस्तिष्क कैसर होता है: नया अध्ययन

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  • Publish Date - July 17, 2026 / 05:38 PM IST,
    Updated On - July 17, 2026 / 05:38 PM IST

(सारा डाइपस्ट्रेटन और जॉन (एडी) ला मार्का, वाल्टर और एलिजा हॉल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च)

लंदन, 17 जुलाई (द कन्वरसेशन) विद्युत चुंबकीय तरंगें हमारे चारों ओर मौजूद हैं। इन्हीं की वजह से आप रेडियो चालू करने पर संगीत सुन पाते हैं, वाई-फाई का उपयोग कर पाते हैं, उपग्रह नौवहन (जीपीएस) से अपना रास्ता खोज पाते हैं और मोबाइल फोन पर कॉल कर पाते हैं।

ये विद्युत चुंबकीय विकिरण का एक प्रकार हैं। विद्युत चुंबक स्पेक्ट्रम के कमजोर सिरे पर स्थित होती हैं। इसका मतलब है कि इनमें सबसे कम ऊर्जा होती है और इनकी तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होती है।

लेकिन, चूंकि विद्युतचुंबकीय विकिरण के बहुत ज़्यादा ऊर्जा वाले रूप – जैसे कि एक्स-रे – कैंसर का कारण बन सकते हैं, इसलिए लंबे समय से यह चिंता रही है कि रेडियो तरंगें भी मनुष्य के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

पिछले दो दशकों में मोबाइल फोन के उपयोग में तेजी से वृद्धि होने के बाद यह चिंता विशेष रूप से बढ़ गई कि क्या लंबे समय तक मोबाइल फोन को कान से लगाकर इस्तेमाल करने से मस्तिष्क कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

वर्ष 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने विद्युत चुंबकीय तरंगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने के लिए 13 वैज्ञानिक समीक्षा अध्ययन कराने का निर्णय लिया।

आज जारी किए गए एक नए अध्ययन ने इन सभी समीक्षाओं के निष्कर्षों का विश्लेषण किया है। इसमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि मोबाइल फोन से निकलने वाली विद्युतचुंबकीय तरंगें मस्तिष्क, सिर या गर्दन में कैंसर का कारण बनती हैं। आइए देखते हैं कि इस अध्ययन में और क्या-क्या सामने आया।

क्या कैंसर का डर वास्तव में किसी ठोस आधार पर था?

कम ऊर्जा वाले विकिरण के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंता की शुरुआत शीत युद्ध के दौर में मानी जाती है।

यह वही दौर था जब माइक्रोवेव ओवन और टेलीविजन जैसी नई तकनीकें पहली बार बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुईं और कई घरों में पहुंचने लगीं।

माइक्रोवेव, यानी वह विद्युत चुंबकीय विकिरण जिसका उपयोग हम खाना गर्म करने के लिए करते हैं। उसमें मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगों की तुलना में थोड़ी अधिक ऊर्जा होती है लेकिन फिर भी इनकी ऊर्जा कम ही होती है।

बाद में साक्ष्यों से यह सामने आया कि कम ऊर्जा वाले विद्युत चुंबकीय विकिरण के संपर्क में आने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर कोई स्पष्ट और लगातार दिखाई देने वाला प्रभाव नहीं पाया गया।

लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा को लेकर कुछ वास्तविक चिंताएं बनी हुई थीं। उदाहरण के लिए, माइक्रोवेव किसी वस्तु को बहुत अधिक गर्म कर सकते हैं। इन चिंताओं के आधार पर उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए सुरक्षा मानक बनाए गए, जो यह तय करते हैं कि ये उपकरण कितनी मात्रा में विकिरण छोड़ सकते हैं और उस पर सीमा लगाते हैं। ये मानक उपलब्ध सबसे अच्छे वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर इन उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

बेशक, यह बात पता थी कि अधिक ऊर्जा वाला विद्युत चुंबकीय विकिरण बहुत खतरनाक होता है और इससे ‘ल्यूकेमिया’ जैसे कैंसर हो सकते हैं।

इसके साथ ही शीत युद्ध की कुछ सनसनीखेज घटनाओं—जैसे सोवियत संघ द्वारा मॉस्को स्थित अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों को माइक्रोवेव विकिरण के जरिए निशाना बनाने के लिए “विद्युत चुंबकीय संकेतों” का जानबूझकर इस्तेमाल किए जाने के आरोप, और एक अमेरिकी राजदूत को ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) होने की घटना—ने भी लोगों की सोच को प्रभावित किया। इन घटनाओं ने संभवतः किसी भी प्रकार की विकिरण, जिसमें कम ऊर्जा वाली विकिरण भी शामिल है, को लेकर डर पैदा किया।

और पिछले कई दशकों में कम ऊर्जा वाली विकिरण छोड़ने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के हमारे उपयोग और संपर्क में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। इसलिए इसके स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर चिंता अब भी व्यापक रूप से बनी हुई है और शायद पहले से भी बढ़ गई है।

भाषा

राजकुमार माधव

माधव