चावल अरबों लोगों का पेट तो भर रहा पर जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता भी बढ़ा रहा

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चावल अरबों लोगों का पेट तो भर रहा पर जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता भी बढ़ा रहा

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  • Publish Date - May 23, 2026 / 04:54 PM IST,
    Updated On - May 23, 2026 / 04:54 PM IST

(हानकिन तियान, जिंगतिंग झांग और शुफेन (सुसान) पैन, बोस्टन कॉलेज)

बॉस्टन, 23 मई (द कन्वरसेशन) चावल दुनिया की आधी से अधिक आबादी का पेट भरता है। दक्षिण-पूर्व एशिया की सीढ़ीनुमा धान की खेती से लेकर चीन और भारत के सिंचित खेतों तक, यह अरबों लोगों का दैनिक भोजन है।

जलमग्न खेतों में धान की पैदावार सबसे अच्छी होती, लेकिन जलमग्न खेत ऐसे सूक्ष्मजीवों के लिए एक अनुकूल माहौल भी बना देते हैं जो जलवायु परिवर्तन पर नकारात्मक असर डालने वाली गैस छोड़ते हैं।

हमारी पर्यावरण और कृषि वैज्ञानिकों की टीम द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया कि 1960 के दशक के बाद से धान के खेतों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैस में दुनिया भर में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है जो वर्ष 2010 के दशक में औसतन हर साल करीब 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड-समतुल्य उत्सर्जन तक पहुंच गया। यह लगभग सालाना 23.9 करोड़ कारों के उत्सर्जन के बराबर है।

इस वजह से पशुपालन के बाद धान की खेती कृषि क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत बन गई है। साथ ही, आने वाले वर्षों में चावल की मांग और बढ़ने की आशंका है।

हालांकि, किसानों के पास ऐसे तरीके मौजूद हैं जिनसे वे उत्पादन घटाए बिना धान की खेती से होने वाले उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। हमारे अध्ययन में पाया गया कि यदि सभी किसान अभी उपलब्ध सर्वोत्तम “जलवायु-अनुकूल” तकनीकों को अपनाएं, तो सदी के मध्य तक वैश्विक स्तर पर धान से होने वाले उत्सर्जन में करीब 10 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है।

लेकिन जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी करने के लिए इससे कहीं अधिक कटौती की जरूरत होगी, जिसके लिए और प्रभावी रणनीतियां विकसित करनी होंगी।

धान से उत्सर्जन क्यों बढ़ा

धान की खेती से उत्सर्जन बढ़ने के दो मुख्य कारण हैं — धान पैदावार क्षेत्रों का विस्तार और खेती के तौर-तरीकों का अधिक गहन होना।

वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन बढ़ने का आधे से अधिक हिस्सा धान की खेती के क्षेत्र के विस्तार से जुड़ा है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका में 1960 के दशक के बाद से धान की खेती का क्षेत्र लगभग दोगुना हो गया है, जिससे वहां मीथेन उत्सर्जन में भी लगभग दो गुना वृद्धि हुई।

इसके साथ ही किसान अब पुआल और गोबर जैसे अधिक खाद और जैविक पदार्थ का इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिक उत्पादन वाली धान की किस्में बोई जा रही हैं और पौधों को पहले की तुलना में अधिक घनत्व के साथ लगाया जा रहा है। इसका नतीजा यह हुआ कि चावल का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी बढ़ गया।

हमारे अध्ययन में पाया गया कि फसल कटाई के बाद धान के डंठलों को खेत में छोड़ देने और बाद में उन्हें मिट्टी में मिला देने का एक खास तरीका 1960 के दशक के बाद धान से होने वाले कुल उत्सर्जन में लगभग 18 प्रतिशत वृद्धि के लिए जिम्मेदार रहा। इसकी वजह यह है कि इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ जाते हैं, जिन्हें सूक्ष्मजीव तोड़ते हैं और इस प्रक्रिया में अधिक मीथेन पैदा होती है।

वैश्विक तापमान बढ़ने से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां और तेज हो जाती हैं, जिससे उत्सर्जन और बढ़ता है।

रासायनिक खाद का इस्तेमाल भी उत्सर्जन बढ़ाने में बड़ा योगदान देता है। वर्ष 2000 के बाद सिंथेटिक नाइट्रोजन खाद के उपयोग में लगभग 76 प्रतिशत वृद्धि हुई, जिससे नाइट्रस ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन बढ़ा। यह भी एक बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। मानव गतिविधियों से होने वाले कुल वैश्विक उत्सर्जन में वृद्धि का करीब नौ प्रतिशत हिस्सा इसी से जुड़ा है।

सिंचाई के तरीके भी उत्सर्जन को प्रभावित करते हैं। पहले सिंचित धान के खेतों को पूरे मौसम में लगातार पानी से भरा रखा जाता था, जिससे गीले वातावरण में पनपने वाले सूक्ष्मजीव लगातार ग्रीनहाउस गैस छोड़ते रहते थे।

हालांकि, पिछले दो दशकों में अधिक किसान रुक-रुक कर सिंचाई करने लगे हैं, यानी खेतों का पानी बीच-बीच में निकाल दिया जाता है।

इस बदलाव से लगातार जलभराव की तुलना में मीथेन उत्सर्जन कम हुआ है। हालांकि, हमने पाया कि गीली और सूखी स्थिति के बीच लगातार बदलाव से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन में हल्की वृद्धि हुई। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस प्रक्रिया में सूक्ष्मजीव मिट्टी के नाइट्रोजन को गैसों में बदल देते हैं, खासकर नाइट्रस ऑक्साइड में।

धान उत्पादन का जलवायु पर असर

धान की खेती का जलवायु पर कुल असर समझना सिर्फ एक गैस को मापने जितना आसान नहीं है।

धान के खेत गीली या जलमग्न मिट्टी के कारण मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड छोड़ते हैं। दूसरी ओर, धान के पौधे बढ़ने के दौरान वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड भी अवशोषित करते हैं। साथ ही, फसल चक्रों के बीच मिट्टी से कार्बन का नुकसान भी होता है।

इसलिए वैश्विक स्तर पर भरोसेमंद आकलन के लिए अलग-अलग गैसों, मिट्टी में कार्बन के बदलाव और समय तथा स्थान के अनुसार उपलब्ध आंकड़ों की अनिश्चितताओं को एक साथ समझना जरूरी होता है।

इसके लिए हमने तीन तरीकों को मिलाकर काम किया।

पहला, एक कंप्यूटर आधारित पारिस्थितिकी मॉडल की मदद से फसल वृद्धि, पानी की स्थिति और मिट्टी की प्रक्रियाओं का आकलन किया गया, ताकि मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और मिट्टी के कार्बन में होने वाले बदलावों का संयुक्त अनुमान लगाया जा सके।

दूसरा, कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित मशीन लर्निंग मॉडल का इस्तेमाल किया गया, ताकि उन क्षेत्रों के अनुमान बेहतर बनाए जा सकें जहां प्रत्यक्ष आंकड़े कम उपलब्ध थे। इससे दुनिया के सभी प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों को अध्ययन में शामिल किया जा सका।

तीसरा, 1,200 से अधिक खेत-आधारित प्रयोगों के विश्लेषण से यह समझने में मदद मिली कि सिंचाई, रासायनिक खाद का उपयोग और फसल अवशेषों के प्रबंधन जैसे तरीके उत्सर्जन को कैसे प्रभावित करते हैं।

इन सभी तरीकों की मदद से हम 1961 से 2020 तक के उत्सर्जन का आकलन कर सके, उसके कारणों को समझ पाए और भविष्य की जलवायु परिस्थितियों में उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों की संभावनाओं का परीक्षण कर सके।

क्या कारगार होगा और क्या नहीं

धान की पैदावार घटाए बिना उत्सर्जन कम करने के कई तरीके मौजूद हैं।

हमारे अध्ययन में पाया गया कि उर्वरकों और फसल अवशेषों का सीमित उपयोग, सिंचाई के दौरान खेतों को कुछ समय के लिए सूखा छोड़ना और जुताई कम करना — इन उपायों को मिलाकर सदी के मध्य तक धान से होने वाले वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत कमी लाई जा सकती है।

हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि रासायनिक खाद की जगह पूरी तरह जैविक विकल्प अपनाना हमेशा जलवायु के लिहाज से बेहतर नहीं होता, हालांकि जैविक खेती में इसे महत्व दिया जाता है।

खेत में सीमित मात्रा में पुआल और फसल अवशेष छोड़ना मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन बहुत अधिक मात्रा में यह मीथेन उत्सर्जन बढ़ा सकता है और मिट्टी से कार्बन का नुकसान तेज कर सकता है।

एक दूसरा विकल्प यह है कि फसल अवशेषों के एक हिस्से को ‘बायोचार’ में बदला जाए। इसमें कम ऑक्सीजन वाली स्थिति में अवशेषों को जलाकर उन्हें बाद में जलमग्न मिट्टी में मिलाया जाता है। बायोचार मिट्टी में कार्बन को स्थिर रखने और मीथेन उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकता है।

सिंचाई का बेहतर प्रबंधन भी उत्सर्जन घटाने का प्रभावी तरीका है। खेतों से समय-समय पर पानी निकालने से मीथेन कम बनती है, हालांकि इससे नाइट्रस ऑक्साइड थोड़ा बढ़ सकता है। यह तरीका खास तौर पर उन क्षेत्रों में प्रभावी है जहां सिंचाई व्यवस्था अच्छी है, जैसे एशिया के बड़े हिस्से।

रासायिनक खाद के उपयोग का बेहतर प्रबंधन भी बेहद प्रभावी रणनीति है, खासकर उन इलाकों में जहां अत्यधिक रासायनिक खाद इस्तेमाल होते हैं, जैसे चीन और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्से। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन नाइट्रस ऑक्साइड बढ़ाती है, लेकिन उससे पैदावार में स्पष्ट बढ़ोतरी नहीं होती। साथ ही यह जल प्रदूषण भी बढ़ाती है। इसलिए अतिरिक्त नाइट्रोजन कम करने से उत्सर्जन और प्रदूषण दोनों घटते हैं और किसानों की लागत भी बचती है।

दो फसलों के बीच खेत की जुताई करने की प्रक्रिया का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग पाया गया। कम जुताई को अक्सर जलवायु-अनुकूल माना जाता है, लेकिन हमारे अध्ययन में पाया गया कि जलमग्न धान के खेतों में यह हमेशा उत्सर्जन कम नहीं करती।

अमेरिका और चीन जैसे समशीतोष्ण क्षेत्रों में ठंडा मौसम मीथेन उत्पादन को सीमित करता है, इसलिए वहां कम जुताई से मिट्टी में कार्बन बनाए रखने का लाभ अधिक मिलता है। लेकिन गर्म और लगातार जलमग्न क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन की स्थिति सूक्ष्मजीव गतिविधि बढ़ा देती है, जिससे मीथेन उत्पादन और मिट्टी से कार्बन का नुकसान दोनों बढ़ जाते हैं।

कुल मिलाकर, हमने पाया कि कोई एक तरीका हर जगह काम नहीं करता। हर क्षेत्र को अपनी परिस्थितियों के अनुसार सबसे प्रभावी रणनीतियां तय करनी होंगी।

धान उत्पादन और जलवायु की सीमा

इस अध्ययन का निष्कर्ष उम्मीद भी जगाता है और चेतावनी भी देता है।

बेहतर और संतुलित कृषि तरीकों को अपनाकर धान की पैदावार घटाए बिना उत्सर्जन में सार्थक कमी लाई जा सकती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर इसकी सीमा सीमित है।

और बड़े स्तर पर उत्सर्जन घटाने के लिए किसानों को यह समझाने की जरूरत होगी कि पुआल या बायोचार जैसे जैविक पदार्थों का कितना उपयोग सबसे उपयुक्त है। साथ ही, ऐसी नयी प्रौद्योगिकियों और रणनीतियों को विकसित करना होगा जो धान उत्पादन को प्रभावित किए बिना उत्सर्जन को और कम कर सकें।

द कन्वरसेशन

खारी पवनेश

पवनेश