सिडनी, नौ अगस्त (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर ऐसे चश्मा पहने लोग अच्छी खासी संख्या में दिख जाएंगे जिससे वे आसपास की तस्वीरें और वीडियो बेहद सहजता से रिकॉर्ड कर सकते हैं। इसकी बड़ी वजह ‘केमार्ट’ है, जिसने हाल में सस्ते “कैमरा वाले चश्मे” बाजार में उतारे हैं और ये देखते ही देखते बिक गए हैं।
ये चश्मे ‘केमार्ट’ के अपने ब्रांड ‘आंको’ के हैं जिनकी कीमत महज 89 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर है, जबकि ‘मेटा’ और ‘रे-बैन’ के इसी तरह के उत्पादों की कीमत 337 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से शुरू होती है।
‘कैमरा वाले चश्मे’ को बड़े उपभोक्ता चलन में बदलने की इस कोशिश की एक कीमत है और वह कीमत चश्मा पहनने वाले की ही नहीं, बल्कि उसके आसपास मौजूद हर व्यक्ति की निजता को चुकानी पड़ सकती है। हमें अभी इस बात ही ज्यादा जानकारी नहीं है कि इन उपकरणों से जुटाए गए डेटा के साथ क्या होता है या इनसे रिकॉर्ड की गई तस्वीरें आखिर कौन देख सकता है। यही वजह है कि शुक्रवार को संघीय अटॉर्नी-जनरल मिशेल रोलैंड ने ऑस्ट्रेलिया के निजता आयुक्त से इस तकनीक की तत्काल समीक्षा करने को कहा।
तो क्या मौजूदा निजता कानून तकनीक की इस नयी लहर से निपटने के लिए पर्याप्त मजबूत हैं?
एक दशक से अधिक समय से जारी है विकास
स्मार्ट चश्मे कोई नयी चीज नहीं हैं। गूगल ने 2013 में ‘गूगल ग्लास’ पेश किया था। उस समय मीडिया में इसकी खूब चर्चा हुई और कई मशहूर हस्तियों ने भी इसका समर्थन किया।
लेकिन यह शुरुआती मॉडल बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाया। इसकी प्रौद्योगिकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, इसका भारी-भरकम और साफ नजर आने वाला डिजाइन भी लोगों को खास पसंद नहीं आया। ऊपर से इसके उपयोगकर्ताओं का मजाक उड़ाते हुए उन्हें “ग्लासहोल्स” कहा जाने लगा।
आज के स्मार्ट चश्मे कहीं ज्यादा आकर्षक दिखते हैं। साथ ही, वे कम ध्यान आकर्षित करते हैं। यानी आपके लिए और आपके आसपास के लोगों के लिए यह समझ पाना आसान नहीं है कि आपने एक ‘‘हाई-टेक कंप्यूटर’’ पहन रखा है।
‘केमार्ट’ के सस्ते कैमरा वाले चश्मे भी महंगे मॉडल की तरह कई काम कर सकते हैं, हालांकि संभव है कि वे कुछ काम थोड़े धीमे और सीमित तरीके से करें।
‘हेसायन’ सॉफ्टवेयर पर चलने वाले इन चश्मों में छोटे कैमरे लगे हैं, जो पहनने वाले की नजर के सामने आने वाली तस्वीरों और वीडियो को रिकॉर्ड कर सकते हैं। इनमें आवाज रिकॉर्ड करने के लिए माइक्रोफोन और फोन कॉल करने के साथ-साथ पॉडकास्ट या संगीत सुनने के लिए स्पीकर भी हैं।
तस्वीरें, वीडियो और आवाज चश्मे की मेमोरी में रिकॉर्ड होती हैं। इसके बाद उन्हें चश्मे से जुड़े ऐप में डाउनलोड किया जा सकता है, जहां रिकॉर्ड की गई सामग्री को एडिट करने, साझा करने और वेबसाइट पर अपलोड करने की सुविधा होती है।
चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग से लेकर दुर्घटना तक का खतरा
सबसे ज्यादा जिस खतरे की चर्चा हो रही है, वह है इन चश्मों की मदद से आसपास मौजूद लोगों और सार्वजनिक स्थानों पर अनजान महिलाओं की चोरी-छिपे रिकॉर्डिंग करना। सोशल मीडिया के लिए ऐसा कंटेंट बनाने की होड़ से सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न, ताक-झांक और पीछा किए जाने जैसी घटनाओं में वृद्धि का खतरा पैदा हो सकता है।
रिकॉर्ड किए गए वीडियो को ऑनलाइन अपलोड करना इस खतरे को और बढ़ा सकता है। इसके अलावा, अगर यह प्रौद्योगिकी डिजिटल सूचनाओं को पहनने वाले की नजरों के सामने दिखाकर उसके देखने के अनुभव को “बढ़ाती” है, तो इससे उसका ध्यान भी भटक सकता है। नतीजतन, गिरने या ठोकर लगने से लेकर सड़क दुर्घटना तक के गंभीर शारीरिक खतरे पैदा हो सकते हैं।
कंपनियों और नियोक्ताओं को भी ऐसे जोखिमों पर विचार करना चाहिए। मसलन, स्मार्ट चश्मे कहीं गोपनीय जानकारी या बैंक खातों का विवरण रिकॉर्ड न कर लें।
यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि खबरों के मुताबिक ‘मेटा’ ऐसे “सुपर-सेंसर” वाले चश्मे विकसित कर रही है, जो उस वक्त भी रिकॉर्डिंग कर सकेंगे जब आप उनसे किसी तरह का संपर्क नहीं कर रहे हों। ऐसी प्रौद्योगिकी कंपनियों को आपकी जिंदगी के बेहद निजी पहलुओं, आपकी गतिविधियों और पसंद-नापसंद के बारे में ऐसी जानकारी तक पहुंच दे सकती है, जो पहले कभी संभव नहीं थी।
यह जानकारी ‘डेटा-लेबलिंग’ करने वाली कंपनियों को भेजी जा सकती है और उत्पाद तथा उसकी शर्तों के आधार पर इसका इस्तेमाल कृत्रिम मेधा (एआई) मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए भी किया जा सकता है।
तो कानून क्या कहता है?
यह स्पष्ट नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया के बिखरे हुए, अधूरे और पुराने निजता कानून कैमरा वाले चश्मे जैसी निजता में दखल देने वाली और आसपास की गतिविधियों को लगातार दर्ज करने वाली नयी प्रौद्योगिकी पर किस हद तक लागू होते हैं।
संघीय निजता अधिनियम के ज्यादातर प्रावधान सिर्फ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संगठनों पर लागू होते हैं जिनमें निजी डेटा के संग्रह, भंडारण और इस्तेमाल से जुड़े नियम भी शामिल हैं।
निजी क्षेत्र की संस्थाओं के मामले में भी ये नियम केवल एक निश्चित स्तर से ऊपर की संस्थाओं पर लागू होते हैं।
इसका अर्थ है कि कैमरा वाले चश्मे पहनने वाला कोई व्यक्ति यदि वीडियो या तस्वीरें रिकॉर्ड करता है और उन्हें साझा करता है, तो उसकी यह गतिविधि इन नियमों के दायरे में नहीं आती। हालांकि, यदि कोई कंपनी अपने ऐप के जरिए तस्वीरों समेत निजी आंकड़े जुटाती है और उनका इस्तेमाल करती है, तो उसे निजता कानून का पालन करना होगा।
लेकिन चश्मा पहनने वालों को दूसरे कानूनी जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
निजता कानून के तहत ऐसे मामलों में मुकदमा करने का अधिकार भी है, जहां कोई व्यक्ति आपकी निजता में गंभीर दखल देता है—मसलन, आपकी एकांतता को भंग करता है या आपसे जुड़ी जानकारी का दुरुपयोग करता है। बिना सहमति किसी की बातचीत रिकॉर्ड करना भी निगरानी से जुड़े कानूनों के तहत गैरकानूनी हो सकता है। हालांकि, ये कानून अलग-अलग राज्यों में अलग हैं।
मिसाल के तौर पर न्यू साउथ वेल्स में बिना सहमति किसी निजी बातचीत को रिकॉर्ड करना या प्रकाशित करना गैरकानूनी है, हालांकि इसके कुछ अपवाद हैं।
किसी व्यक्ति या कुछ खास समूहों के सदस्यों की निजी जानकारी को ऑनलाइन इस तरह प्रकाशित करना कि सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति उसे परिस्थितियों के अनुसार धमकी देने या परेशान करने वाला माने, नए संघीय ‘एंटी-डॉक्सिंग’ प्रावधान के तहत अपराध है।
ईसेफ्टी आयुक्त के पास भी ऐसी सामग्री को इंटरनेट से हटाने के लिए कदम उठाने की शक्तियां हैं, जो साइबर-उत्पीड़न या साइबर-धमकी की श्रेणी में आती हैं।
दूसरे शब्दों में, हमारे पास कानून हैं भले ही वे कुछ हद तक बिखरे हुए क्यों न हों। और कैमरा वाले चश्मों की क्षमताओं के सबसे गंभीर दुरुपयोग का शिकार होने वाले लोगों के पास न्याय पाने के कुछ रास्ते मौजूद हैं।
निजता को डिजाइन का हिस्सा बनाने का समय
लेकिन क्या हम सचमुच ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं, जहां हर वक्त और हर जगह हमारी जिंदगी का थोड़ा-बहुत हिस्सा रिकॉर्ड होता रहे?
जब हम ऐसी प्रौद्योगिकियों से घिरे हैं, जो उन लोगों की निजता को भी कमजोर कर रही हैं जिन्हें कभी किसी निजता नीति को पढ़कर उस पर सहमति देने का मौका तक नहीं मिला। ऐसे में क्या हम अपनी हर बातचीत को लेकर लगातार सतर्क रहना चाहते हैं? क्या हमें हर अजनबी से यह पूछते रहना चाहिए कि कहीं वह हमारी रिकॉर्डिंग तो नहीं कर रहा? क्या इसके बेहतर विकल्प हो सकते हैं? या फिर इस तकनीक पर ही रोक लगा देनी चाहिए?
हमारे विचार में, इस मुद्दे पर ज्यादा संतुलित और गहन चर्चा की जरूरत है। आखिरकार, ये प्रौद्योगिकी दिव्यांग लोगों के लिए जीवन बदल देने वाली साबित हो सकती हैं। वे उनके लिए ऐसे स्थानों और अवसरों के दरवाजे खोल सकती हैं, जो उनके लिए बंद रहते।
प्रौद्योगिकी की यह नयी लहर हमारे जीवन का हिस्सा बन रही है, ऐसे में अलग-अलग अधिकारों और हितों के बीच बेहतर संतुलन कायम करने के कई रास्ते हो सकते हैं।
स्कूलों और विश्वविद्यालयों जैसे बड़े नियोक्ताओं और सामाजिक संस्थानों को ऐसी नीतियों पर विचार करना चाहिए, जो उनके साझा परिसरों और स्थानों में लोगों की निजता की रक्षा कर सकें।
और शायद, इस नयी दुनिया से तालमेल बैठाने की पूरी जिम्मेदारी लोगों पर डालने के बजाय ऑस्ट्रेलिया को इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उसके निजता और अन्य उपभोक्ता कानून यह सुनिश्चित कैसे करें कि उपभोक्ताओं और कारोबारों के लिए बनाए जाने वाले उत्पादों में निजता की सुरक्षा को शुरुआत से ही डिजाइन का हिस्सा बनाया जाए।
आखिरकार, प्रौद्योगिकी का स्वरूप कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बदला ही न जा सके। उसका स्वरूप हमारे चुनाव से तय होता है—और यह तय करने में हमारी भी आवाज होनी चाहिए कि तकनीक हमारे जीवन में किस तरह जगह बनाए।
द कन्वरसेशन खारी रंजन
रंजन