(टी जे थॉमसन, आरएमआईटी विश्वविद्यालय)
मेलबर्न, 24 अगस्त (द कन्वरसेशन) किसी दावे की पुष्टि करनी हो तो इंटरनेट पर लोग कभी कहा करते थे, ‘‘तस्वीर दिखाओ, तभी मानेंगे।’’ लेकिन तकनीक ने अब यह स्थिति बदल दी है।
आज हम अक्सर ऐसी तस्वीरों और वीडियो से रूबरू होते हैं, जिनमें अविश्वसनीय और काल्पनिक चीजें वास्तविक नजर आती हैं। वैश्विक नेताओं को ऐसी बातें कहते हुए दिखाया जाता है, जो उन्होंने कभी कही ही नहीं। सार्वजनिक हस्तियां ऐसे नकली उत्पादों का समर्थन करती नजर आती हैं, जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं होता। यहां तक कि ऐसी आपदाएं भी हमारी आंखों के सामने घटती दिखाई देती हैं, जो वास्तव में हुई ही नहीं।
अब कोई भी व्यक्ति कृत्रिम मेधा (एआई) की मदद से अलग-अलग उद्देश्यों के लिए वास्तविक जैसी दिखने वाली तस्वीरें और वीडियो बना सकता है। इससे दृश्य साक्ष्य की प्रकृति और तस्वीरों तथा वीडियो के साथ हमारे जुड़ाव में व्यापक बदलाव आया है।
इंटरनेट पर एआई से तैयार हो रही बेतहाशा भ्रामक सामग्री संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर कर रही है, संसाधनों की भारी बर्बादी कर रही है और लोगों को धोखाधड़ी का शिकार बनाकर उनकी मेहनत की कमाई हड़प रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एआई के दौर में हम किन तस्वीरों पर भरोसा कर सकते हैं? और इस चुनौती से निपटने के लिए लोग और संस्थाएं क्या कदम उठा रही हैं?
दृश्य साक्ष्य का बदलता स्वरूप:
हम आज भी कई परिस्थितियों में तस्वीरों और वीडियो को साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यह साबित करना हो कि ‘उबरईट्स’ का ऑर्डर सही समय पर और सुरक्षित पहुंचा, तो तस्वीर ले लीजिए। यह साबित करना हो कि आपने कोई अनुचित व्यवहार नहीं किया, तो वीडियो बना लीजिए।
लेकिन एआई का इस्तेमाल ठगी, गुमराह करने और धोखा देने के लिए तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस हालात से निपटने और कैमरे से खींची तस्वीरों पर लोगों का भरोसा बहाल करने के लिए नए उपाय तलाश रही हैं।
मसलन, गूगल ने 2025 में अपने स्मार्टफोन कैमरों में सामग्री की प्रामाणिकता से जुड़ा सॉफ्टवेयर शामिल करना शुरू किया। यह किसी तस्वीर के स्रोत की पुष्टि करने का एक तरीका है। इसमें सी2पीए नामक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल होता है, जिसे निकॉन, सोनी और कैनन जैसी बड़ी कैमरा कंपनियां भी अपने कैमरों में इस्तेमाल करने लगी हैं।
इसी तरह की लेकिन अलग प्रौद्योगिकी, इस साल के अंत में आईफोन में भी आ सकती है। इस महीने की शुरुआत में आई खबरों के मुताबिक, एप्पल के ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ के अगले संस्करण में ‘‘रेफरेंस इमेज’’ नामक सुविधा शामिल हो सकती है। गूगल के कुछ स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर की तरह यह प्रौद्योगिकी इस बात को साबित करने में मदद कर सकती है कि तस्वीर वास्तव में कैमरे या किसी उपकरण से खींची गई है और एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीर नहीं है।
इसका काम करने का तरीका यह है कि सॉफ्टवेयर पहले मूल तस्वीर और उससे जुड़ी जानकारी को सत्यापन के लिए एप्पल के पास भेजता है। अगर सब कुछ सही पाया जाता है, तो तस्वीर को एक विशिष्ट पहचान संख्या दी जाती है। इस पहचान संख्या के जरिए दूसरे लोग यह पता लगा सकते हैं कि तस्वीर कब की है और उसे किस उपकरण से ली गई थी।
लेकिन, जाहिर है इसकी कुछ सीमाएं भी हैं।
दृश्य साक्ष्य की सीमाएं:
पहली बात, अगर यह सुविधा शुरू की जाती है तो यह स्वत: आधार पर (डिफॉल्ट) निष्क्रिय रहेगी। उपयोगकर्ताओं को इसे खुद चालू करना होगा।
दूसरी बात, इसे चालू करने के बाद भी यह आपकी पहले से मौजूद तस्वीरों पर काम नहीं करेगी। साथ ही, आपके द्वारा भविष्य में खींची जाने वाली सभी तस्वीरों पर भी यह खुद ब खुद काम नहीं करेगी।
तस्वीर खींचने से पहले आपको तय करना होगा कि क्या यह ऐसी तस्वीर है, जिसकी बाद में प्रामाणिकता साबित करने की जरूरत पड़ सकती है। अपनी हाल की पसंदीदा खाने की तस्वीर या अन्य ऐसी किसी तस्वीर की प्रामाणिकता साबित करने की शायद आपको जरूरत न पड़े, लेकिन ऑनलाइन मंगाई गई कोई वस्तु टूटी पहुंची हो या सड़क पर हुआ कोई झगड़ा वास्तव में हुआ है, यह दिखाना हो तो आपके लिए इस तरह की तकनीक काम में आ सकती है।
तीसरी बात, ‘‘सत्यापित’’ तस्वीरें भी धोखा दे सकती हैं या लोगों को गुमराह कर सकती हैं। तस्वीर खींचने वाला व्यक्ति विषय से कितनी दूरी पर है, इसका असर तस्वीर के कोण पर पड़ता है। कैमरे का तेज शटर किसी व्यक्ति के चेहरे के एक ऐसे भाव को कैद कर सकता है, जो वास्तव में उसके विचार या राजनीतिक रुख का प्रतिनिधित्व न करता हो। इसके अलावा, कैमरे के सामने किसी घटना को इस तरह दर्शाया जा सकता है कि इसे पहले से रचा गया हो या अभिनय किया गया हो।
प्रौद्योगिकी आधारित समाधान से आगे क्या?
तो इन सबका मतलब क्या है? किसी तस्वीर पर ‘‘सत्यापित’’ का निशान होने का निश्चित रूप से यह मतलब नहीं है कि तस्वीर में दिखाई गई बात सच है। इसी तरह, ऐसा निशान न होने का मतलब यह भी नहीं है कि तस्वीर फर्जी है।
प्रामाणिकता से जुड़े ये संकेत तस्वीर के समय और उसे लेने वाले उपकरण के बारे में कुछ जानकारी जरूर दे सकते हैं, लेकिन वे पूरी कहानी नहीं बताते।
आपको अभी भी अपनी विवेक-बुद्धि और उस सामग्री को पेश किए जाने के व्यापक संदर्भ का इस्तेमाल करना होगा, ताकि यह समझ सकें कि आप जो देख रहे हैं उसका मतलब क्या है और उस पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं।
स्रोत भी महत्वपूर्ण है। हो सकता है कि हम किसी एक तस्वीर या सामग्री को बहुत गहराई से जांचने के बजाय उसके स्रोत पर अधिक भरोसा करने लगें।
अगर हमें यह पता ही नहीं है कि सामग्री का स्रोत क्या है या उसके भरोसेमंद होने का कोई आधार नहीं है, तो बेहतर होगा कि हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएं। इसकी एक वजह यह भी है कि अधिकांश वयस्कों के पास सीमित समय और तथ्य जांचने की सीमित क्षमता होती है, जबकि हमारे सामने इतने अधिक दावे आते हैं कि हर दावे की जांच करना संभव नहीं है।
आखिरकार, किसी तस्वीर या वीडियो की उत्पत्ति और प्रामाणिकता बताने वाली तकनीक इस पूरी पहेली का एक उपयोगी हिस्सा हो सकती है, लेकिन वह पूरी तस्वीर नहीं दिखाती।
द कन्वरसेशन
खारी वैभव
वैभव