‘अच्छी देखभाल’ के साथ मरने की भी कीमत होती है, पर हर व्यक्ति इसे वहन नहीं कर सकता

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‘अच्छी देखभाल’ के साथ मरने की भी कीमत होती है, पर हर व्यक्ति इसे वहन नहीं कर सकता

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  • Publish Date - March 8, 2026 / 06:06 PM IST,
    Updated On - March 8, 2026 / 06:06 PM IST

(हेनरिटा बायरन, एलेक्स ब्रूम और कैथरीन केनी, सिडनी विश्वविद्यालय द्वारा)

सिडनी, आठ मार्च (द कन्वरसेशन) हर व्यक्ति चाहता है कि उसके जीवन के अंतिम दिन शांति, सुकून और अच्छी देखभाल के साथ गुजरें। लेकिन जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके लोगों पर किये गये शोध से पता चलता है कि बहुत से लोगों के साथ वास्तव में ऐसा नहीं हो पाता।

इसके विपरीत, असल में स्थिति यह है कि किसी व्यक्ति को जीवन के अंतिम समय में सम्मानजनक और शांतिपूर्ण देखभाल मिल पाएगी या नहीं, यह काफी हद तक उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर होता जा रहा है।

हमारे हाल के एक अध्ययन में, हमने एक देखभाल केंद्र में जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके 18 लोगों के साक्षात्कार लिए। इसके अलावा छह परिवार के सदस्यों और देखभाल करने वालों के तथा 20 देखभाल करने वाले पेशेवरों का साक्षात्कार लिया।

हमने उनसे पूछा कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर किसी की देखभाल करना कैसा होता है।

‘पैलिएटिव केयर’ उन लोगों के लिए है, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, जिन्हें कोई ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज संभव नहीं है। इसका मतलब है कि उनके ठीक होने की संभावना बहुत कम या न के बराबर है। इसलिए, इसका उद्देश्य जीवन के अंतिम समय में उन्हें आराम और बेहतर जीवन प्रदान करना है।

ऑस्ट्रेलिया में, ‘पैलिएटिव केयर’ मुख्य रूप से निःशुल्क प्रदान की जाती है, जिसका ज्यादातर खर्च राज्य और संघीय सरकारों के साथ-साथ निजी स्वास्थ्य बीमा द्वारा वहन किया जाता है।

लेकिन हमारे शोध से पता चलता है कि सार्वजनिक और निजी वित्तपोषण की अव्यवस्थित व्यवस्था के कारण कई लोग इस आवश्यक देखभाल के लिए भुगतान कैसे करें, इस बारे में भ्रमित और परेशान हैं।

यह देखभाल घर पर या अस्पताल में, धर्मशाला में या आवासीय वृद्धाश्रम में प्रदान की जा सकती है। देखभाल का खर्च कौन वहन करेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह कहां प्रदान की जा रही है (उदाहरण के लिए, निजी या सार्वजनिक अस्पताल में) और क्या रोगी के पास निजी स्वास्थ्य बीमा है।

पिछले शोधों में यह पता लगाया गया है कि ऑस्ट्रेलिया में देखभाल के लिए धन कैसे जुटाया जाता है। लेकिन अब तक हमें मरीजों, देखभाल करने वालों और कर्मचारियों से सीधे तौर पर यह जानकारी नहीं मिली है कि यह उन्हें कैसे प्रभावित करता है।

हमारा शोध एक बड़े शहर के अस्पताल में स्थित एक विशेष देखभाल इकाई में हुआ।

यूनिट में काम करने वाले लोगों ने हमें बताया कि गतिविधि-आधारित वित्तपोषण मॉडल – जिसमें अस्पतालों को उनके द्वारा इलाज किए जाने वाले रोगियों की संख्या और प्रकार के आधार पर भुगतान किया जाता है – देखभाल की गुणवत्ता के बजाय दक्षता पर ध्यान केंद्रित करता है।

जिन लोगों से हमने बातचीत की, उनमें से कुछ ने बताया कि वे दवाओं और ऑक्सीजन जैसे आवश्यक उपकरणों के लिए अपनी जेब से भुगतान कर रहे थे और उन्हें उम्मीद थी कि सरकार इन खर्चों को शामिल करेगी।

मरीजों को इस बात का भलीभांति एहसास था कि मौजूदा स्वास्थ्य प्रणाली में समय ही पैसा है।

हमारे शोध से पता चलता है कि पैसा और उसके बारे में चिंता करना, जीवन के अंतिम पड़ाव पर लोगों के अनुभवों को कैसे प्रभावित कर सकता है।

रोगियों और देखभाल करने वालों के लिए सरकारी अनुदान को अधिक सुलभ बनाने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि सभी को जीवन के सुखद अंत का समान अवसर मिले। यह सुविधा निश्चित अवधि के लिए नहीं, बल्कि लोगों की आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध होनी चाहिए।

(द कन्वरसेशन)

देवेंद्र संतोष

संतोष