(योषिता सिंह)
न्यूयॉर्क, 25 सितंबर (भाषा) विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार नहीं होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हताशा बढ़ रही है और इन सुधारों का विरोध करने वाले देश इस वैश्विक संगठन का केवल ‘‘इस्तेमाल’’ कर रहे हैं तथा उन्हें इसकी वास्तव में कोई परवाह नहीं है।
जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के लिए विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के न्यूयॉर्क में जुटने पर संगठन में सुधार का मुद्दा हर साल उठता रहा है लेकिन ‘‘मुझे लगता है कि अब इसे लेकर भावना और मजबूत हो रही है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हताशा बढ़ रही है। अगर हम सुधार को लेकर वाकई गंभीर हैं तो लिखित मसौदे के आधार पर बातचीत होनी चाहिए। बिना किसी मसौदे के बातचीत नहीं हो सकती। इसके बिना बातचीत करना मतलब समय खींचना है।’’
जयशंकर ने कहा कि ‘‘सुधार की जरूरत को लेकर भावना और गहरी हुई है।’’
उन्होंने बृहस्पतिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के इतर ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ (ओआरएफ), ‘रिलायंस फाउंडेशन’, भारत में संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन द्वारा आयोजित ‘रप्चर्स एंड रैम्पार्ट्स: बिल्डिंग ब्रिजेज फॉर ए चेंजिंग वर्ल्ड’ (विभाजन और बाधाओं के बीच बदलती दुनिया के लिए सेतु निर्माण) विषय पर मंत्रिस्तरीय सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह भावना है कि संयुक्त राष्ट्र को बदलना होगा और उसे वास्तविक दुनिया की मौजूदा परिस्थितियों के अधिक अनुरूप बनना होगा।
जयशंकर ने कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र में बदलाव की मांग का मूल कारण यही है। संयुक्त राष्ट्र को समय से पीछे माना जा रहा है। यह संयुक्त राष्ट्र का विरोध नहीं है। वास्तव में जो लोग संयुक्त राष्ट्र की परवाह करते हैं, वे इसमें सुधार चाहते हैं। मेरा मानना है कि जो लोग सुधार का विरोध करते हैं, उन्हें वास्तव में संयुक्त राष्ट्र की परवाह नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘वे संयुक्त राष्ट्र का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है… और आज यह भावना पहले से कहीं अधिक मजबूत है।’’
ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन द्वारा संचालित सत्र में जमैका की विदेश एवं विदेश व्यापार मंत्री कमिना जॉनसन स्मिथ, सूरीनाम के विदेश, अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं सहयोग मंत्री मेल्विन बाउवा, घाना के विदेश मंत्री सैमुअल ओकुडजेटो अब्लाक्वा और ‘ईस्ट-वेस्ट सेंटर’ की अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सेलेस्ट कॉनर्स ने भी हिस्सा लिया।
जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि सुधार के लिए सर्वसम्मति जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘लोकतंत्र में, अपने देश में भी, हम बहुमत और मतदान के जरिए फैसले करते हैं। यही लोकतांत्रिक तरीका है। लोगों के अलग-अलग विचार होंगे। हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए और उसके बाद मतदान होना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि अगर वास्तव में सुधार की इच्छा है तो बातचीत के लिए एक लिखित मसौदा होना जरूरी है।
जयशंकर ने कहा, ‘‘उस मसौदे में सभी के विचार शामिल करने होंगे और फिर उन विचारों पर लोकतांत्रिक तरीके से फैसला करना होगा।’’
उन्होंने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों में अब एक-दूसरे के साथ अधिक सहयोग करने की इच्छा दिखाई दे रही है।
जयशंकर ने कहा, ‘‘देश एक-दूसरे से अधिक बातचीत करने और मिलकर अधिक काम करने के इच्छुक हैं। यह अपने आप में अच्छी बात है क्योंकि इससे पुरानी निर्भरताएं टूटती हैं… और दुनिया अधिक लोकतांत्रिक बनती है।’’
‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का उपयोग मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील, कम विकसित या उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के लिए किया जाता है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव के चयन के संदर्भ में भी ‘‘किसी महिला को महासचिव चुने जाने का विचार ऊपर से थोपा गया नहीं, बल्कि यह नीचे के स्तर से उठी मांग है।’’
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने महासभा की उच्चस्तरीय आम बहस के दौरान अपने अंतिम संबोधन में दुनियाभर के नेताओं से सुरक्षा परिषद में सुधार का आह्वान करते हुए कहा था कि इसे मौजूदा वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए और आज की भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनना चाहिए।
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और इसकी स्थायी एवं अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग लंबे समय से करता रहा है। भारत का कहना है कि 1945 में गठित 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप नहीं है और यह मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती।
भारत लगातार इस बात पर भी जोर देता रहा है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का हकदार है। भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता का भी दावेदार है, जिसके लिए चुनाव अगले वर्ष जून में होंगे।
भाषा सिम्मी मनीषा
मनीषा