लंदन, 23 जनवरी (एपी) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान पर शुक्रवार को ब्रिटेन में आक्रोश देखा गया कि अफगानिस्तान युद्ध के दौरान नाटो देशों के सैनिक अग्रिम मोर्चे से दूर रहे थे।
स्विट्जरलैंड के दावोस में बृहस्पतिवार को ‘फॉक्स न्यूज’ को दिए एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं है कि अनुरोध किए जाने पर नाटो अमेरिका का समर्थन करने के लिए मौजूद रहेगा।
ट्रंप ने कहा, ‘‘मैंने हमेशा कहा है, अगर हमें कभी उनकी जरूरत पड़ी तो क्या वे मौजूद रहेंगे? यही असली परीक्षा है और मुझे इस पर यकीन नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें कभी उनकी जरूरत नहीं पड़ी, हमने उनसे कभी कुछ मांगा भी नहीं। आप जानते हैं, वे कहेंगे कि उन्होंने अफगानिस्तान में कुछ सैनिक भेजे थे या कुछ और, तथा उन्होंने भेजे भी थे, लेकिन वे अग्रिम मोर्चे से थोड़ा पीछे रहे।’’
ब्रिटेन में ट्रंप के इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। ब्रिटेन ने 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अफगानिस्तान में और दो साल बाद इराक में अधिक विवादास्पद रूप से अमेरिका का समर्थन किया था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 9/11 के बाद कहा था कि अलकायदा के हमलों के जवाब में ब्रिटेन अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा।
अमेरिका के नेतृत्व में 2001 में हुए आक्रमण के बाद के वर्षों में 1,50,000 से अधिक ब्रिटिश सैनिकों ने अफगानिस्तान में सेवा दी, जो अमेरिका के बाद सबसे बड़ी टुकड़ी थी और इस अभियान में उसके 457 सैनिक मारे गए।
ब्रिटेन के रक्षा मंत्री जॉन हीली ने कहा, ‘‘उन ब्रिटिश सैनिकों को उनके वास्तविक स्वरूप में याद किया जाना चाहिए: वे नायक थे जिन्होंने हमारे राष्ट्र की सेवा में अपने प्राणों का बलिदान दिया।’’
सांसद बेन ओबेसे-जेक्टी (रॉयल यॉर्कशायर रेजिमेंट में कप्तान के रूप में अफगानिस्तान में सेवा दे चुके) ने कहा, ‘‘यह देखकर दुख होता है कि हमारे राष्ट्र और हमारे नाटो सहयोगियों के बलिदान को अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा इतना कम आंका जा रहा है।’’
भाषा
शुभम नेत्रपाल
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