विश्व के पहले एआई-डिज़ाइन टीके का मानव परीक्षण, महामारी रोकथाम की दिशा में बड़ी उपलब्धि

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विश्व के पहले एआई-डिज़ाइन टीके का मानव परीक्षण, महामारी रोकथाम की दिशा में बड़ी उपलब्धि

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  • Publish Date - June 10, 2026 / 04:33 PM IST,
    Updated On - June 10, 2026 / 04:33 PM IST

( नील मेबॉट, एडिनबरा यूनिवर्सिटी )

एडिनबरा (ब्रिटेन), 10 जून (द कन्वरसेशन) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से नए प्रकार का एक टीका विकसित किया है, जिसका मुख्य घटक पूरी तरह एआई ने डिज़ाइन किया है।

इस टीके का पहली बार मनुष्यों पर परीक्षण किया गया है और इसे भविष्य की महामारियों से बचाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम माना जा रहा है।

अनुसंधानकर्ताओं का लक्ष्य एक ऐसा “ब्रॉड-स्पेक्ट्रम” टीका विकसित करना है, जो केवल एक वायरस या उसके किसी एक स्वरूप तक सीमित न होकर पूरे वायरस परिवार के खिलाफ सुरक्षा दे सके। इसका उद्देश्य न केवल सभी ज्ञात कोरोना वायरस स्वरूपों से बचाव करना है, बल्कि ऐसे संबंधित बैट (चमगादड़) वायरसों से भी सुरक्षा देना है, जो भविष्य में इंसानों में फैलकर महामारी का रूप ले सकते हैं।

पारंपरिक टीके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी एक विशेष वायरस की पहचान करना सिखाते हैं, लेकिन वायरस समय के साथ तेजी से बदलते (म्यूटेट) रहते हैं। जब वायरस में पर्याप्त बदलाव हो जाता है, तो पुराने टीके प्रभावी नहीं रहते। यही कारण है कि फ्लू के टीके हर साल बदलने पड़ते हैं और कोविड-19 टीके भी कई बार अपडेट किए गए हैं।

एआई आधारित यह नई तकनीक इस समस्या को हल करने का प्रयास करती है। एआई हजारों संबंधित वायरसों के आनुवंशिक डेटा का विश्लेषण कर उन हिस्सों की पहचान करता है जो विभिन्न स्वरूपों में समान रहते हैं और समय के साथ उनके बदलने की संभावना कम होती है। इन्हीं स्थिर हिस्सों को लक्षित कर ऐसे टीके बनाए जा सकते हैं जो पूरे वायरस परिवार पर असर करे।

कैम्ब्रिज टीम ने यह तकनीक “सार्बेकोवायरस” परिवार पर लागू की, जिसमें सार्स और कोविड-19 पैदा करने वाले वायरस के साथ-साथ कई पशु कोरोना वायरस भी शामिल हैं। एआई ने इन विषाणुओं में मौजूद साझा और स्थिर विशेषताओं की पहचान की, जिन्हें टीके के आधार के रूप में इस्तेमाल किया गया।

यह टीका पारंपरिक एमआरएनए टीके से अलग डीएनए तकनीक पर आधारित है। डीएनए टीके अधिक स्थिर होते हैं और इन्हें स्टोर तथा ट्रांसपोर्ट करना आसान होता है, खासकर उन देशों में जहां कोल्ड-चेन (शीत भंडारण) व्यवस्था सीमित होती है।

इसके अलावा, इस टीके को सुई के बिना भी दिया जा सकता है। इसे उच्च दबाव वाली तरल धारा के जरिए त्वचा में पहुंचाया जाता है, जिससे टीकाकरण प्रक्रिया अधिक सरल, कम दर्दनाक और बड़े पैमाने पर तेज़ हो सकती है।

अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, इस तरह की व्यापक सुरक्षा देने वाला टीका सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए परिवर्तनकारी साबित हो सकता है। यह न केवल मौजूदा विषाणुओं से बचाव करेगा, बल्कि नए और उभरते विषाणुओं के खिलाफ भी शुरुआती सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में किसी नए वायरस के फैलने की स्थिति में तेजी से नियंत्रण पाया जा सकेगा और उसे वैश्विक महामारी बनने से रोका जा सकेगा।

इस तकनीक को फ्लू जैसी बीमारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि फ्लू वायरस हर साल तेजी से बदलता है और टीकों की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि वैज्ञानिक सही स्वरूप का अनुमान लगा पाते हैं या नहीं। एक “यूनिवर्सल फ्लू वैक्सीन” इस समस्या को खत्म कर सकता है।

यह पहली बार है जब एआई-डिज़ाइन टीके का मानव परीक्षण किया गया है। परीक्षण में पाया गया कि यह डीएनए टीका प्रतिरक्षा प्रणाली को ऐसी एंटीबॉडी बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जो विभिन्न प्रकार के सार्बेकोवायरस को पहचान सकें।

अनुसंधानकर्ताओं ने इसे सुरक्षित पाया है। हालांकि, अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अभी अपेक्षाकृत मध्यम थी और सुरक्षा कितने समय तक बनी रहेगी, यह स्पष्ट नहीं है।

इसके अलावा, यह भी पता लगाना बाकी है कि क्या भविष्य में बूस्टर डोज की आवश्यकता होगी और क्या यह टीका वास्तविक दुनिया में संक्रमण को प्रभावी रूप से रोक सकता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर क्लिनिकल परीक्षण की आवश्यकता होगी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि एक सार्वभौमिक टीका बनाने में अभी कुछ साल और लगेंगे, लेकिन यह अध्ययन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि एआई तकनीक टीका विकास की गति और दायरे को पूरी तरह बदल सकती है तथा भविष्य की महामारियों से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती है।

द कन्वरसेशन मनीषा नेत्रपाल

नेत्रपाल