(मार्कस वैगनर, वॉलोन्गॉन्ग विश्वविद्यालय)
वॉलोन्गॉन्ग (ऑस्ट्रेलिया), 26 जुलाई (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया की कपड़ा कंपनी नैशी को हाल में अमेरिका की सरकार से एक लाख से अधिक डॉलर की राशि प्राप्त हुई, जिस पर छह प्रतिशत ब्याज भी दिया गया। यह राशि उस शुल्क के बदले लौटाई गई, जो कंपनी ने अमेरिका में आयात पर चुकाया था। नैशी उन हजारों कारोबारियों में से एक है, जिन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए शुल्क (टैरिफ) की राशि वापस मिल रही है।
करीब 166 अरब अमेरिकी डॉलर की वापसी राशि में से 85 अरब डॉलर से अधिक कारोबारियों को पहले ही लौटाए जा चुके हैं।
फरवरी में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने इन शुल्क को रद्द कर दिया था, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था और राजनीति को जो नुकसान हुआ, और ट्रंप प्रशासन को जो कुछ राजनीतिक लाभ मिला, उसकी पूरी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
शुल्क लंबे समय तक लागू रखने के उद्देश्य से नहीं लगाए गए
अप्रैल 2025 में ट्रंप ने जो शुल्क लगाए थे, वे अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए थे। वर्ष 1977 का यह कानून राष्ट्रपति को असाधारण विदेशी खतरों से निपटने के अधिकार देता है, लेकिन इसमें कहीं भी ‘टैरिफ’ शब्द का उल्लेख नहीं है।
अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने 20 फरवरी 2026 को छह-तीन के बहुमत से फैसला सुनाया कि आईईईपीए के तहत शुल्क लगाने का अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान के अनुसार कर और सीमा शुल्क लगाने का अधिकार केवल संसद (कांग्रेस) के पास है।
इस फैसले ने राष्ट्रपति के शुल्क लगाने के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण सीमा तय कर दी। हालांकि, इससे ट्रंप की शुल्क नीति समाप्त नहीं हुई, क्योंकि शुरुआत से ही इसका उद्देश्य दुनिया के बाकी देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंधों को नए सिरे से तय करने के लिए समय हासिल करना था।
इसके जवाब में ट्रंप ने पूरी दुनिया पर 10 प्रतिशत का अस्थायी शुल्क लगाया, जिसकी 150 दिन की वैधानिक अवधि 24 जुलाई को समाप्त हो गई।
ट्रंप ने अनुचित व्यापारिक गतिविधियों, राष्ट्रीय सुरक्षा और बंधुवा मजदूरी से जुड़े मामलों से संबंधित अन्य कानूनों के तहत भी कुछ देशों पर शुल्क लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
इन कानूनों के तहत पहले विदेशी व्यापारिक गतिविधियों की जांच और लंबी कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इससे प्रक्रिया भले ही लंबी हो जाती है, लेकिन जांच के दौरान तैयार दस्तावेज और साक्ष्य अदालत में कानूनी कसौटी पर परखे जा सकते हैं।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के कथित बंधुआ मजदूरी से संबंधित निष्कर्षों ने 24 जुलाई 2026 से ऑस्ट्रेलिया, चीन, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन सहित 54 देशों के निर्यात पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाने का आधार तैयार कर दिया है।
इस तरह, उच्चतम न्यायालय ने भले ही एक कानूनी रास्ता बंद कर दिया हो, लेकिन ट्रंप प्रशासन पहले ही दूसरा रास्ता अपनाने की तैयारी कर चुका था और उसे इसके लिए और समय भी मिल गया।
अमेरिका पर वित्तीय बोझ
शुल्क वापस करने के कारण इस वर्ष जून में अमेरिकी सरकार का राजकोषीय घाटा 120 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि जून 2025 में 27 अरब डॉलर का अधिशेष दर्ज किया गया था।
हालांकि, लौटाए जा रहे 166 अरब डॉलर कोई जुर्माना नहीं हैं। इसका बड़ा हिस्सा वह धन है, जिसे सरकार ने कानूनी अधिकार के बिना वसूला था और अब उसे वापस करना पड़ रहा है। यह निश्चित रूप से बड़ी राशि है, लेकिन 2026 में संघीय सरकार के अनुमानित कुल खर्च का यह दो प्रतिशत से भी कम है।
दिलचस्प बात यह है कि ‘‘लिबरेशन डे’’ की तरह शुल्क वापसी को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक प्रचार नहीं हुआ।
क्या केवल धन लौटाने से नुकसान की भरपाई हो जाती है?
रकम की वापसी से कारोबारियों को हुई आर्थिक और व्यावसायिक क्षति की भरपाई नहीं हो जाती और न ही वे पहले जैसी स्थिति में लौट पाते हैं।
महीनों तक आयातकों की पूंजी फंसी रही। लागत लगातार बढ़ती गई, कई ऑर्डर रद्द हुए और माल गोदामों में पड़ा रहा। अनेक कंपनियों को अपने अनुबंधों पर फिर से बातचीत करनी पड़ी।
उन्हें सीमा शुल्क एजेंट और वकील पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। यह स्पष्ट होने तक कि किस वस्तु पर कितना टैरिफ लगेगा, उन्होंने दूसरे निवेश भी टाल दिए। कई कंपनियों ने तो यह अनिश्चितता देखते हुए अमेरिका को माल भेजना ही बंद कर दिया कि आखिर उन्हें कितना सीमा शुल्क देना पड़ेगा।
छोटे कारोबार सबसे अधिक प्रभावित हुए। उनके पास नकदी कम होती है, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता सीमित होते हैं और अचानक बढ़े सीमा शुल्क का बोझ उठाने की क्षमता भी कम होती है।
एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका में प्रत्येक छोटे आयातक कारोबारियों को औसतन 3,06,000 डॉलर अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ा।
अटलांटा के फेडरल रिजर्व बैंक का अनुमान है कि आर्थिक रूप से कमजोर कंपनियों को कुल वापसी राशि का 34 प्रतिशत यानी लगभग 56 अरब डॉलर मिलेगा। ऐसी कंपनियां इस धन का उपयोग निवेश बढ़ाने, नए कर्मचारियों की भर्ती करने या कीमतें घटाने में कर सकती हैं।
वहीं, मजबूत कंपनियां इस राशि को बचत, कर्ज चुकाने या शेयरधारकों में वितरित करने पर प्राथमिकता देंगी। पेप्सीको ने कहा है कि वह इस राशि का इस्तेमाल कच्चे माल की बढ़ती लागत की भरपाई के लिए करेगी।
हालांकि, यह संभावना बहुत कम है कि कंपनियां यह लाभ ग्राहकों तक पहुंचाएंगी, क्योंकि ऐसा करना जटिल और लागत वाला है। निन्टेंडो के खिलाफ उसके अपने ग्राहकों ने मुकदमा दायर किया है। उनका तर्क है कि शुल्क वापसी का लाभ उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए, क्योंकि ऊंची कीमतों का बोझ आखिरकार उन्होंने ही उठाया है।
शुल्क वापसी तक पहुंच भी सभी के लिए समान नहीं है। जिन कारोबारियों के पास अमेरिका में बैंक खाता और सीमा शुल्क एजेंट है, उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से राशि मिल रही है।
इसके विपरीत, ऑस्ट्रेलिया डाक सेवा के माध्यम से अमेरिका माल भेजने वाले ऑस्ट्रेलिया के कारोबारियों को अभी और इंतजार करना पड़ रहा है। उनके माल का पंजीकरण अमेरिकी सीमा शुल्क प्रणाली में उस तरीके से नहीं हुआ, जिसके जरिए शुल्क वापस किया जाता है। फिलहाल उनके लिए कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है।
इसके अलावा, वापसी की राशि हमेशा उस व्यक्ति तक नहीं पहुंचती, जिसने वास्तव में इसका बोझ उठाया था। यह राशि आयातक को मिलती है, भले ही उसने बढ़ी हुई कीमतों के जरिए पूरा खर्च खुदरा विक्रेता या उपभोक्ताओं पर डाल दिया हो।
अनिश्चितता भी बनी हुई है
ट्रंप की शुल्क नीति का सबसे महत्वपूर्ण असर लगातार बनी रहने वाली अनिश्चितता है।
ट्रंप किसी भी समय व्यापार में तत्काल व्यवधान पैदा कर सकते हैं और फिर उसी व्यवधान का इस्तेमाल दूसरे देशों के साथ बातचीत में दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं। इसका ताजा उदाहरण सोमवार को कनाडा के कई उत्पादों पर लगाया गया 50 प्रतिशत शुल्क है।
लगातार बनी रहने वाली यह अनिश्चितता वैश्विक व्यापार को ऐसे प्रतिस्पर्धी व्यापारिक गुटों में बांट रही है, जहां बाजार तक पहुंच के नियम अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट और अनुमानित होते हैं।
हमारी ‘वेपनाइज्ड ट्रेड’ परियोजना से भी पता चलता है कि सबसे बड़ा खतरा यह है कि दूसरे देश भी यही तरीका अपनाने लगें और इस तरह के व्यापारिक प्रतिबंध अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य व्यवस्था बन जाएं।
ऐसे उपायों को अदालत में चुनौती देकर निरस्त कराने में महीनों, बल्कि कई बार वर्षों लग जाते हैं।
द कन्वरसेशन
खारी दिलीप
दिलीप