नयी दिल्ली, नौ जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एनएसई की पूर्व प्रबंध निदेशक (एमडी) एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) चित्रा रामकृष्ण की उस याचिका को बृहस्पतिवार को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ‘को-लोकेशन’ घोटाला मामले में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत उनके खिलाफ आरोपों पर संज्ञान लेने संबंधी निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की पीठ ने कहा कि एनएसई एक ‘सार्वजनिक दायित्व’ निभाता है और याचिकाकर्ता उसकी सीईओ एवं प्रबंध निदेशक होने के नाते ऐसे कार्य और दायित्व का निर्वहन कर रही थीं, जिससे आम जनता का हित जुड़ा हुआ है।
पीठ ने चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए एनएसई के निदेशक मंडल द्वारा दी गई मंजूरी को भी बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि यह मंजूरी केवल इस सीमित प्रश्न पर निर्भर थी कि उन पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम लागू होता है या नहीं। केवल इसी आधार पर इसे निरस्त नहीं किया जा सकता।
रामकृष्ण ने दलील दी थी कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में ‘लोक सेवक’ की परिभाषा अत्यधिक अस्पष्ट है और इसलिए इसे असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि किसी निजी कंपनी में कार्यरत व्यक्ति पर यह प्रावधान लागू नहीं हो सकता।
इस याचिका का केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और केंद्र सरकार ने विरोध किया।
उच्च न्यायालय ने 54 पृष्ठ के अपने फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में ‘लोक सेवक’ की परिभाषा इतनी अस्पष्ट या अनिश्चित नहीं है कि उसे असंवैधानिक ठहराया जाए।
अदालत ने कहा कि एनएसई एक मान्यता प्राप्त शेयर बाजार है, जो केवल एक सामान्य व्यावसायिक संस्था नहीं है, बल्कि निवेशकों के हितों की रक्षा सहित सार्वजनिक हित से जुड़े महत्वपूर्ण आर्थिक कार्य करता है। साथ ही, इसकी अधिकांश हिस्सेदारी सरकारी कंपनियों के पास है।
पीठ ने कहा कि एनएसई अपने अधिकारियों के माध्यम से कार्य करता है, इसलिए याचिकाकर्ता को संस्था द्वारा किए जाने वाले कार्यों से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि एनएसई के आंतरिक प्रबंधन में याचिकाकर्ता सार्वजनिक दायित्व निभा रही थीं या नहीं तथा दैनिक कामकाज और नीतिगत निर्णयों में उनकी क्या भूमिका थी, यह साक्ष्यों के आधार पर तय होने वाला विषय है और इस स्तर पर इसका फैसला नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि तथ्यों और कानून से जुड़े ऐसे मिश्रित प्रश्नों के आधार पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के आरोपपत्र को भी रद्द नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा, ‘उपरोक्त कारणों से हमें इस याचिका में कोई दम नहीं दिखता। इसलिए याचिका और इससे संबंधित लंबित आवेदन को खारिज किया जाता है।’
भाषा योगेश अजय
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