मुंबई, 10 अप्रैल (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को उच्च-स्तरीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की पहचान करने के मानदंडों में बदलाव का प्रस्ताव किया। इसके तहत पिछली मानक-आधारित प्रणाली के बजाय संपत्ति आधार को अपनाने और सार्वजनिक क्षेत्र की एनबीएफसी को इसमें शामिल करने का प्रस्ताव किया गया है।
‘भारतीय रिजर्व बैंक (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का पंजीकरण, छूट और आकार आधारित विनियमन रूपरेखा) दूसरा संशोधन निर्देश, 2026’ के मसौदे के अनुसार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति वाली एनबीएफसी को उच्च-स्तरीय (अपर लेयर) माना जाएगा।
आरबीआई की वेबसाइट पर जारी मसौदे में कहा गया, ”एनबीएफसी- ‘अपर लेयर’ की पहचान के लिए पारदर्शी, सरल और पूर्ण मानदंड अपनाने के लिए मौजूदा पद्धति को संपत्ति के आकार के मानदंड से बदलने का प्रस्ताव है, जो इस समय एक लाख करोड़ रुपये और उससे अधिक प्रस्तावित है।”
यह मसौदा ऐसे समय में आया है जब नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को सूचीबद्ध किए जाने पर काफी चर्चा हो रही है। सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस मुख्य निवेश कंपनी को कोई राहत मिलेगी।
आरबीआई के नियमों के अनुसार उच्च-स्तरीय शीर्ष 15 संस्थाओं को सूचीबद्ध होना अनिवार्य है। इस सूची में शामिल होने के बावजूद, अक्टूबर 2025 की समय सीमा बीत जाने के बाद भी केवल टाटा संस सूचीबद्ध नहीं हुई है।
मसौदे में सरकारी स्वामित्व वाली एनबीएफसी को भी उच्च-स्तरीय सूची में शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया है। इसमें कहा गया है, ”इस समय आकार आधारित विनियमन ढांचा सरकारी एनबीएफसी को ‘निचले स्तर’ या ‘मध्य स्तर’ में रखता है, न कि ‘उच्च-स्तर’ में। एनबीएफसी के लिए स्वामित्व तटस्थ नियामक व्यवस्था के सिद्धांत के तहत अब पात्र सरकारी एनबीएफसी को भी संशोधित मानदंडों के आधार पर एनबीएफसी-यूएल की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव है।”
मार्च 2025 तक टाटा संस की संपत्ति का आधार 1.75 लाख करोड़ रुपये था। कई सरकारी उपक्रम, जो आकार में काफी बड़े हैं, अब तक ‘उच्च-स्तरीय’ सूची से बाहर थे।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा था कि रिजर्व बैंक एनबीएफसी पर एक संशोधित रूपरेखा लेकर आएगा।
भाषा पाण्डेय रमण
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