नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) आर्थिक शोध संगठन ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (जीटीआरआई) ने बुधवार को कहा कि 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) लगाए जाने से छोटे व्यापारी और कीमत को लेकर सतर्क रहने वाले उपभोक्ता फिर नकद भुगतान की ओर लौट सकते हैं।
व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान (पी2एम) पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर 15 अक्टूबर से लागू होगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। इसके अलावा रेलवे, दूरसंचार सेवाओं, बीमा और ईंधन जैसे कुछ क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर पांच रुपये का रियायती एमडीआर लागू होगा।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट में कहा, ‘‘एमडीआर छोटे व्यापारियों और कीमत को लेकर सतर्क रहने वाले उपभोक्ताओं को फिर से नकदी की ओर धकेल सकता है।’’
उन्होंने कहा कि यूपीआई शुल्क लागू किए जाने का संबंध आय अर्जित करने से नहीं है। यूपीआई को मुफ्त रखने में सरकार का 2,000-2,500 करोड़ रुपये सालाना खर्च होता है।
श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘यह राशि खाद्य सब्सिडी पर 2.03 लाख करोड़ रुपये, उर्वरक सब्सिडी पर 1.68 लाख करोड़ रुपये, कृषि ऋण पर 22,800 करोड़ रुपये और पेट्रोलियम एवं एलपीजी पर 12,500 करोड़ रुपये की सब्सिडी की तुलना में बहुत कम है।’’
उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने वित्त वर्ष 2024-25 में खुद 3,270 करोड़ रुपये की आय अर्जित की और 1,552 करोड़ रुपये का अधिशेष रखा।
श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘असली दबाव राजस्व की जरूरत नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि मुफ्त यूपीआई और रुपे ने अरबों लेनदेन को वीजा और मास्टरकार्ड से दूर कर दिया है, जबकि ये कार्ड भुगतान पर आमतौर पर 1-3 प्रतिशत नेटवर्क शुल्क अर्जित करते हैं।
श्रीवास्तव ने कहा कि ब्राजील ने अमेरिकी दबाव और अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क के बावजूद अपने यूपीआई जैसे सार्वजनिक भुगतान तंत्र ‘पिक्स’ को कमजोर करने से इनकार कर दिया है।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत को भी इसी तरह का रुख अपनाना चाहिए था। सरकार मुफ्त यूपीआई को आसानी से वहन कर सकती है।’’
श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि अमेरिका भविष्य में रुपे कार्ड पर प्रतिबंध और एनपीसीआई की प्रस्तावित 30 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी सीमा को वापस लेने का दबाव बना सकता है।
भाषा यासिर अजय
अजय