छत्रपति संभाजीनगर, 15 मई (भाषा) चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने केंद्र सरकार के चीनी निर्यात पर अचानक लगाए गए प्रतिबंध की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे घरेलू बाजार में कीमतों में गिरावट आएगी, चीनी मिलों का कर्ज बढ़ेगा और गन्ना किसान भी इससे प्रभावित होंगे।
भारत सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए इस वर्ष 30 सितंबर तक चीनी निर्यात पर रोक लगा दी है।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पैदा हुई अनिश्चितताओं और महंगाई की चिंताओं के बीच यह कदम उठाया गया है।
वेस्ट इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भैरवनाथ ठोंबरे ने कहा कि घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में पहले ही गिरावट शुरू हो गई है और इससे चीनी मिलों के लिए किसानों का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) बकाया चुकाना मुश्किल हो जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘‘सरकार द्वारा 30 सितंबर तक निर्यात पर अचानक लगाई गई रोक से वैश्विक बाजार में भारतीय चीनी मिलों की छवि खराब होगी।’’
ठोंबरे ने कहा कि भारत श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल और अरब देशों को चीनी निर्यात करता है तथा यह प्रतिबंध उन कारोबारी समझौतों को प्रभावित करेगा, जिन पर पहले ही बातचीत हो चुकी है।
उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र की चीनी मिलों पर एफआरपी का करीब 1,550 करोड़ रुपये बकाया है, जबकि देशभर में यह राशि लगभग 12,000 करोड़ रुपये है। गन्ने की खेती का क्षेत्रफल भले ही न घटे, लेकिन किसानों को अपनी उपज से पर्याप्त कमाई नहीं होगी।’
ठोंबरे ने कहा कि यदि सरकार ने चीनी निर्यात पर रोक लगाई है तो उसे चीनी आधारित एथनॉल की खरीद बढ़ानी चाहिए।
उन्होंने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण का स्तर मौजूदा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने की मांग की।
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने आरोप लगाया कि सरकार की चीनी उद्योग के लिए कोई स्थायी नीति नहीं है।
उन्होंने कहा, “चीनी उद्योग से जुड़े संगठन पिछले चार वर्षों से चीनी के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इसके बजाय सरकार ने चार बार एफआरपी बढ़ाया। इससे उद्योग पर पहले ही बड़ा असर पड़ा है और अब यह फैसला चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति को और कमजोर करेगा।”
भाषा योगेश रमण
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