(फाइल तस्वीर के साथ)
नयी दिल्ली, 25 सितंबर (भाषा) वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) लगाने के फैसले में बाहरी दबाव होने के आरोप को ‘पूरी तरह निराधार’ बताते हुए कहा है कि यह भुगतान परिवेश का एक पेशेवर फैसला है।
सीतारमण ने पीटीआई-वीडियो के साथ बातचीत में कहा कि एमडीआर लगाने का फैसला भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई), भुगतान बैंकों एवं मर्चेंट बैंकों ने मिलकर लिया है और इसे सरकार की तरफ से नहीं थोपा गया है।
पिछले सप्ताह वित्त मंत्रालय ने कहा था कि 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर कारोबारी को 0.4 प्रतिशत की दर से एमडीआर देना होगा। अधिकतम 300 रुपये तक लगने वाला यह शुल्क 15 अक्टूबर से लागू होगा।
उन्होंने एमडीआर को उपभोक्ताओं पर लगा कर बताने वाले विपक्ष के आरोप पर कहा, ‘‘एमडीआर न तो कोई कर है और न ही कोई अधिभार या उपकर है। इससे जुटाई जाने वाली राशि भारत सरकार की संचित निधि में नहीं जाएगी।’’
एमडीआर से जुटाई गई राशि यूपीआई परिवेश से जुड़े बैंकों और अन्य संस्थाओं के बीच बांटी जाएगी। इसमें से 40 प्रतिशत राशि ग्राहक के बैंक, 30 प्रतिशत भुगतान गेटवे, 20 प्रतिशत यूपीआई ऐप और शेष 10 प्रतिशत राशि यूपीआई ऐप के प्रायोजक बैंक को मिलेगी।
सीतारमण ने बाहरी, विशेषकर अमेरिका के दबाव में यूपीआई भुगतान पर एमडीआर लगाने के विपक्ष के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर कहा, ‘‘यह बिल्कुल निराधार है। मैं इसका पूरी तरह खंडन करती हूं।’’
उन्होंने विपक्ष पर मुद्दे तलाशने और मामले को पूरी तरह समझे बिना उसकी आलोचना करने का आरोप लगाया।
एमडीआर व्यवस्था के तहत व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान और 2,000 रुपये तक के व्यापारी भुगतान पर कोई एमडीआर नहीं लगेगा। सरकार का कहना है कि इससे करीब 96 प्रतिशत व्यापारी लेनदेन प्रभावित नहीं होंगे।
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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