Muslim Property Laws: ‘सिर्फ इतनी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं मुस्लिम’ विधवा पत्नी को हाईकोर्ट से मिला न्याय, जानिए क्या है पूरा मामला

Muslim Property Laws: 'सिर्फ इतनी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं मुस्लिम' विधवा पत्नी को हाईकोर्ट से मिला न्याय, जानिए क्या है पूरा मामला

Muslim Property Laws: ‘सिर्फ इतनी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं मुस्लिम’ विधवा पत्नी को हाईकोर्ट से मिला न्याय, जानिए क्या है पूरा मामला

Muslim Property Laws: 'सिर्फ इतनी संपत्ति की वसीयत कर सकते हैं मुस्लिम' विधवा पत्नी को हाईकोर्ट से मिला न्याय, जानिए क्या है पूरा मामला / Image: AI Generated

Modified Date: February 10, 2026 / 01:37 pm IST
Published Date: February 10, 2026 1:36 pm IST
HIGHLIGHTS
  • कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए किसी को दे सकता है
  • कानूनी वारिसों की स्पष्ट सहमति होना अनिवार्य
  • मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का दिया हवाला

बिलासपुर: Muslim Property Laws छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम समुदाय की वसीयत को लेकर बड़ा फैसला लिया है। कोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि कोई मुस्लिम अपनी एक तिहाई से ज़्यादा जायदाद वसीयत के ज़रिए किसी को नहीं दे सकता, जब तक कि बाकी वारिसों की रज़ामंदी न हो। यह फैसला एक विधवा की याचिका पर आया, जिसे निचली अदालतों ने उसके पति की जायदाद में हिस्सा देने से इनकार कर दिया था।

वसीयत को लेकर बड़ा फैसला

Muslim Property Laws दरअसल मामला कोरबा जिले का है, जहां रहने वाले 64 साल की जैबुननिशा ने साल 2004 में पति अब्दुल सत्तार लोधिया की मौत के बाद उनकी जायदाद पर अधिकार मांगते हुए कोर्ट में याचिका दायर की। पति की मौत के बाद भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने अपने पक्ष में एक वसीयत प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया था कि सारी जायदाद उसे ही मिलेगी। सिकंदर ने खुद को पालक बेटा बताया था। जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह उनकी रज़ामंदी के बिना बनाई गई थी।

हाईकोर्ट ने बदल दिया निचली अदालत का फैसला

मामले में उन्होंने निचली अदालतों में केस दायर किया, लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी। वहीं, इसके बाद जैबुननिशा ने हाईकोर्ट की शरण ली। मामले में जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की सिंगल सुनवाई हुई और कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने विधवा के कानूनी हक को सुरक्षित रखने में गलती की। कोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत के ज़रिए जायदाद देने की एक सीमा है। एक मुस्लिम अपनी जायदाद का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। अगर इससे ज़्यादा जायदाद वसीयत की जाती है, या किसी वारिस को दी जाती है, तो उसके लिए बाकी वारिसों की स्पष्ट रज़ामंदी ज़रूरी है।

विधवा पर डाल दिया बोझ: हाईकोर्ट

जस्टिस गुरु ने यह भी कहा कि निचली अदालतों ने गलती की और विधवा पर वसीयत को गलत साबित करने का बोझ डाल दिया। असल में यह सिकंदर की ज़िम्मेदारी थी कि वह साबित करे कि जैबुननिशा ने पति की मौत के बाद अपनी मर्जी से और पूरी समझदारी से वसीयत के लिए सहमति दी थी। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ चुप रहने या केस दायर करने में देरी करने को रज़ामंदी नहीं माना जा सकता। इस मामले में कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर पाया कि जैबुननिशा ने पूरी जायदाद वसीयत करने की इजाज़त दी थी। अगर सिकंदर की वसीयत असली भी होती, तब भी वह जायदाद का एक तिहाई से ज़्यादा हिस्सा नहीं मांग सकता था। कोर्ट ने पिछले फैसलों को रद्द कर दिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि वारिसों के हक की हिफाज़त मुस्लिम कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है। कोर्ट ने कहा, कानूनी एक तिहाई से ज़्यादा की वसीयत वारिसों की मौत के बाद की रज़ामंदी के बिना प्रभावी नहीं हो सकती।

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