Reported By: Vishal Vishal Kumar Jha
,CG High Court Judgment/Image: AI Generated
CG High Court Judgment: छत्तीसगढ़ की बिलासपुर हाईकोर्ट ने अपील में बरी होने पर बर्खास्तगी की अवधि के वेतन पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया हो, और बाद में वह अपील में बरी हो जाए, तो केवल बरी होने के आधार पर उसे बर्खास्तगी की अवधि का पूरा बकाया वेतन पाने का अधिकार नहीं मिल जाता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया, कि ऐसे मामलों में “काम नहीं तो वेतन नहीं” का सिद्धांत लागू होगा। कोर्ट ने यह फैसला विद्युत मंडल के पूर्व कर्मचारी की अपील खारिज करते हुए दिया है।
CG High Court Judgment दरअसल, कर्मचारी को सहायक श्रेणी-1 सिविल के पद पर नियुक्ति मिली और बाद में पर्यवेक्षक सिविल पद पर पदोन्नत हुआ। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज हुआ था। विशेष अदालत ने उसे दोषी ठहराया, जिसके बाद सक्षम प्राधिकारी ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया। कर्मचारियों ने दोषसिद्धि के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। इस दौरान वह रिटायरमेंट की आयु भी पूरी कर चुका था। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उसे आरोपों से बरी किया। इसके बाद विभाग ने बर्खास्तगी का आदेश वापस ले लिया, लेकिन बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृत्ति तक की अवधि का वास्तविक वेतन और अन्य आर्थिक लाभ देने से इनकार कर दिया।
कर्मचारी ने विभाग के इस निर्णय को चुनौती दी, लेकिन सिंगल बेंच ने उसकी याचिका खारिज (CG High Court Judgment) कर दी। जिस पर डबल बैंच में अपील करते हुए तर्क दिया गया कि जब दोष नहीं हुआ, और उसे बरी कर दिया गया, तब उसे उस अवधि का वेतन और भत्ते मिलने चाहिए, जिसके दौरान वह सेवा से बाहर रहा। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा, कि यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के कारण सेवा से हटाया गया हो, बाद में बरी होने की स्थिति में वह बकाया वेतन का दावा अधिकार के रूप में नहीं कर सकता।