रायपुर, 16 जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ के एक जिला उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी के डीलर को एक डॉक्टर द्वारा खरीदी गई कार के बदले ई20 पेट्रोल मानक के अनुरूप नयी कार देने का निर्देश दिया है। आयोग ने कहा कि डीलर ने 16 महीने पहले निर्मित वाहन बेचा और बार-बार मरम्मत के बावजूद इंजन में आ रही लगातार खराबी को दूर करने में विफल रहा।
आयोग ने 14 जुलाई को जारी अपने आदेश में कहा कि मारुति सुजुकी और उसके डीलर ने दोषपूर्ण वाहन वापस लेने तथा उसी मॉडल की ई20 ईंधन के अनुकूल इंजन वाली नयी कार देने से इनकार कर सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक आचरण किया है।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की अतिरिक्त पीठ (रायपुर) ने यह भी निर्देश दिया कि यदि 45 दिन के भीतर नयी कार उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो डीलर और निर्माता कंपनी को शिकायतकर्ता को वाहन, पंजीकरण और बीमा के लिए चुकाई गई 20.50 लाख रुपये की राशि वापस करनी होगी। इसके अलावा उन्हें मुआवजा और मुकदमेबाजी का खर्च भी अदा करना होगा।
यह आदेश आयोग के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीज ने रायपुर निवासी डॉ. प्रेमराज देबता द्वारा दायर शिकायत पर दिया।
आयोग ने शिकायतकर्ता को मानसिक पीड़ा के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये देने का भी आदेश दिया। यह राशि 45 दिन के भीतर अदा करनी होगी।
आदेश के अनुसार, शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्होंने तीन जून 2024 को कंपनी के अधिकृत डीलर नेक्सा मैग्नेटो (स्काया ऑटोमोबाइल्स) से मारुति ग्रैंड विटारा इंटेलिजेंट इलेक्ट्रिक (स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड) ज़ेटा प्लस 1.5 सीवीटी का टॉप-एंड मॉडल 18.29 लाख रुपये में खरीदा था। बीमा और आरटीओ शुल्क सहित उन्होंने मारुति सुजुकी के डीलर को कुल 20,50,494 रुपये का भुगतान किया था।
आदेश के अनुसार, वाहन पर विस्तारित वारंटी लागू थी, जो मई 2029 या एक लाख किलोमीटर चलने तक (इनमें से जो भी पहले हो) मान्य थी।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के वकील ने बताया कि करीब 21,913 किलोमीटर चलने के बाद 11 नवंबर 2024 को वाहन के इंजन की चेतावनी लाइट जल उठी और कार बीच रास्ते में बंद हो गई। शुरुआत में डीलर के सर्विस सेंटर ने खराबी के लिए मिलावटी ईंधन को जिम्मेदार ठहराया और ईंधन टैंक खाली कर उसमें नया पेट्रोल भर दिया।
हालांकि, शिकायतकर्ता के अनुसार, करीब 60 किलोमीटर चलने के बाद वाहन फिर बंद हो गया। उन्होंने बताया कि ईंधन टैंक की कई बार सफाई किए जाने और डीलर द्वारा हर बार समस्या दूर होने का भरोसा दिए जाने के बावजूद इंजन में खराबी लगातार बनी रही। इसके चलते शिकायतकर्ता को बार-बार वाहन को मरम्मत के लिए वर्कशॉप ले जाना पड़ा।
शिकायतकर्ता के वकील के अनुसार, डॉक्टर ने उस पेट्रोल पंप से भी संपर्क किया, जहां उन्होंने वाहन में ईंधन भरवाया था। हालांकि, पेट्रोल पंप संचालक ने बताया कि ईंधन की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप थी और अन्य किसी ग्राहक से इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली थी।
शिकायतकर्ता ने बताया कि बाद में मारुति सुजुकी ने उन्हें ई-मेल के जरिये सूचित किया कि ईंधन में मिलावट के कारण कार के इंजन और कुछ अन्य पुर्जों को बदलना होगा, जिसपर करीब 5.30 लाख रुपये का खर्च आएगा। शिकायतकर्ता का आरोप है कि वाहन वारंटी में होने के बावजूद कंपनी ने यह मरम्मत नि:शुल्क करने से इनकार कर दिया।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बार-बार मरम्मत के बावजूद वाहन के इंजन और हाइब्रिड सिस्टम में खराबी आती रही। इसके चलते उन्होंने दोषपूर्ण वाहन के बदले नयी कार उपलब्ध कराने या पूरी राशि वापस करने की मांग की। साथ ही, कंपनी और डीलर पर सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापारिक व्यवहार अपनाने का आरोप लगाया।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आयोग ने कहा कि वाहन का निर्माण जनवरी 2023 में हुआ था, लेकिन उसे शिकायतकर्ता को जून 2024 में बेचा गया, यानी निर्माण के करीब 16 महीने बाद उसकी बिक्री की गई। आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता को करीब एक वर्ष चार माह पहले निर्मित वाहन बेचा गया, जिसमें ई20 ईंधन के अनुरूप इंजन नहीं था।
आयोग ने यह भी कहा कि ईंधन कई बार बदलने और ईंधन टैंक की बार-बार सफाई कराने के बावजूद गाड़ी में खराबी आती रही। इसके कारण शिकायतकर्ता को बार-बार सर्विस सेंटर के चक्कर लगाने पड़े।
आयोग ने माना कि प्रतिवादी पक्षों ने दोषपूर्ण वाहन वापस लेने और उसके बदले उसी मॉडल की ई20 ईंधन के अनुरूप इंजन वाली नयी कार उपलब्ध कराने से इनकार कर सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापारिक व्यवहार किया।
आयोग ने डीलर और निर्माता कंपनी को मौजूदा वाहन वापस लेकर शिकायतकर्ता को 45 दिन के भीतर ई20 ईंधन के अनुरूप इंजन से लैस नयी ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड ज़ेटा प्लस कार उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
आदेश में कहा गया है कि यदि 45 दिन के भीतर ऐसा नहीं किया जाता, तो वाहन की कीमत, आरटीओ शुल्क और बीमा प्रीमियम सहित कुल 20,50,494 रुपये शिकायतकर्ता को वापस करने होंगे।
आयोग ने मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवज़े के तौर पर एक लाख रुपये और कानूनी कार्यवाही के खर्च के लिए 10,000 रुपये देने का भी आदेश दिया, जिनका भुगतान 45 दिनों के भीतर किया जाना है।
साथ ही, यह भी आदेश दिया गया कि यदि तय समय-सीमा के भीतर इन राशियों का भुगतान नहीं किया जाता है, तो भुगतान होने तक इनपर सात प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज लगेगा।
भाषा आशीष सुरेश
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