IBC24 Chhatttisgarh Ki Baat
IBC24 Chhatttisgarh Ki Baat : रायपुर : नमस्कार आप देख रहे हैं छत्तीसगढ़ का नंबर वन डिबेट शो। छत्तीसगढ़ की बात। “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान..” लेकिन जब सवाल सियासी गलियारे का हो तो… टिकट हो या समीकरण, जाति पूछी ही जाती है। हालांकि राजनीतिक दल ये दावा जरुर करते हैं कि वे जाति, समुदाय की सियासत नहीं करते। लेकिन चुनावी नतीजों को किसी भी पलड़े की ओर झुका देने की ताकत रखने वाले समाज और जाति के लिए सियासी दल शीर्षासन करने लगते हैं। ‘जाति’ की दुहाई, देकर सियासी मोर्चे पर लड़ाई को किस करवट लाई है। इस विषय पर खुलकर डिबेट करेंगे। पहले देख लेते हैं ये रिपोर्ट।
ये वो तस्वीरें हैं जब छत्तीसगढ़ के साहू, सिख और सिंधी समाज के लोग प्रदेश के सियासी दलों से मिलने पहुंचे थे। ये दबाव बनाने के लिए कि चुनाव में उनके समाज के लोगों को भी टिकट दी जाए। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा ने इस बार अपनी रणनीति बदल दी है। क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन की बजाय उसने सिर्फ जिताऊ कैंडिडेट को ही टिकट देने का फैसला किया है। पार्टी की पहली सूची में ये बात देखने को भी मिली है। लेकिन साहू, सिंधी और सिख समाज के लोग भाजपा और कांग्रेस से रायपुर की अलग-अलग तीन सीटों पर अपने ही समाज के लोगों को टिकट दिए जाने की मांग कर रहे हैं।
भाजपा नेताओं का कहना है कि टिकट मांगने का अधिकार हर लोगों को है… और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि भाजपा ने हमेशा से समाज और धर्म के नाम पर राजनीति की है। कैबिनेट मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि बीजेपी ने राम भगवान को भी एजेंट बना दिया है। टिकट में भी जातिवाद की राजनीति करती है।
छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से 39 सीटें रिजर्व हैं, क्योंकि प्रदेश में करीब 32 फीसदी आबादी आदिवासियों की, 13 फीसदी अनुसूचित जाति वर्ग की और करीब 50 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग की है। OBC वर्ग में करीब 95 से ज्यादा जातियां शामिल हैं। जिनमें सबसे ज्यादा करीब 22 फीसदी साहू समाज के लोग हैं। प्रदेश की 37 विधानसभा में साहू वोटर प्रभावी भूमिका में हैं। यही वजह है कि आदिवासी और अनुसूचित जाति के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर OBC वोट बैंक पर रहती है। रायपुर की दो सीटों पर सिंधी और सिख समुदाय के वोटर नतीजे किसी भी पक्ष में कर देने की ताकत रखते हैं। यही वजह है कि साहू, सिंधी और सिख समाज की मांग को कोई भी सियासी दल अनदेखा नहीं कर सकता।