Jhiram Ghati Kand Chhattisgarh: 'जिस दिन भूपेश बघेल जेब में रखे सबूत को सार्वजनिक करेंगे...उस दिन सामने आएगा झीरम कांड का असली सच' अजय चंद्राकर ने कांग्रेस नेताओं पर साधा निशाना
रायपुर: Jhiram Ghati Kand Chhattisgarh 25 मई 2013…ये दिन भले की आपकी जेहन में धुंधली पड़ गई हो लेकिन ये दिन भारतीय इतिहास का काला दिन के रूप में याद किया जाता है। इसी दिन छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के झीरम घाटी में नक्सलियों ने भीषण नरसंहार करते हुए तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा समेत 32 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। आज झीरम घाटी कांड की 13वीं बरसी है, लेकिन आज तक इस घटना के असली जिम्मेदार तक कानून के लंबे हाथ पहुंच नहीं पाए। हालांकि इस घटना को लेकर प्रदेश से लेकर देश के सियासी गलियारों में राजनीतिक बयानबाजी होती रही। वहीं, अब झीरम कांड की 13वीं बरसी पर एक बार फिर सियासत शुरू हो गई है।
Jhiram Ghati Kand Chhattisgarh झीरमकांड के 13 साल पूरे होने पर पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि ”जिस दिन भूपेश बघेल अपने जेब में रखे सबूत को सार्वजनिक करेंगे, कवासी लखमा को सामने रख प्रदेश की जनता को घटनाक्रम बताएंगे, चरण दास महंत ने कवासी लखमा को हॉस्पिटल में क्या कहा था? ये बातें सामने आएगी, परतें ख़ुद-ब-ख़ुद खुलती जाएगी। कांग्रेस सहानुभूति के लिए अपना राजनीतिक ऑक्सीजन बना रखा है। जबकि भाजपा ने इस मामलें में हर स्तर की कार्रवाई की है।
वहीं, झीरम कांड को लेकर पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने अपने अधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि ”शहीदों को शत् शत् नमन! झीरम घाटी हत्याकांड में शहीद नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा वीर जवानों को कोटि-कोटि नमन। झीरम का हमला महज़ एक नक्सली वारदात नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने का एक क्रूर और सुनियोजित राजनैतिक षड्यंत्र था, जिसमें नक्सलियों ने चुन-चुनकर, नाम पूछ-पूछकर हमारे नेताओं की हत्या की थी। 13 साल का लंबा वक्त बीत गया, लेकिन झीरम घाटी की वो चीखें व ज़ख्म आज भी ताज़ा हैं। झीरम के पीड़ितों का न्याय आज भी अधूरा है। हमारे हौसले टूटे नहीं हैं और न्याय की यह लड़ाई अभी थमी नहीं है। हमें दृढ़ विश्वास है कि इस खूनी खेल के पीछे छिपे असली सूत्रधारों और उनके आकाओं का सच एक न एक दिन दुनिया के सामने ज़रूर आएगा। भाजपा ने झीरम हत्याकांड की जाँच न की और न होने दी. यह लड़ाई जारी है और जारी रहेगी।
छत्तीसगढ़ के लिए झीरम घाटी कांड एक कभी न भरने वाले घाव की तरह है। 13 साल बाद भी इस हमले का रहस्य अनसुलझा है। कांग्रेस ने 2020 से इस दिन को झीरम घाटी शहादत दिवस (Jhiram Ghati Shaheed Diwas) के तौर पर मनाने की शुरुआत की है। इस हमले नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल, महेन्द्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, योगेंद्र शर्मा समेत कई दिग्गज नेता और उनके सुरक्षाकर्मी समेत कुल 32 लोग शहीद हुए थे।
आपको बता दें कि साल 2013 के आखिरी में छत्तीसढ़ में विधानसभा चुनाव होने को था। कांग्रेस 10 सालों से सत्ता से दूर था। लेकिन साल 2013 में कांग्रेस पूरा चुनाव जीतने की तैयारी में थी और इसी दौरान कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में परिवर्तन यात्रा (Congress Parivartan Yatra Attack) निकालने का ऐलान भी किया था। 25 मई 2013 को सुकमा जिले में परिवर्तन यात्रा का आयोजन हुआ। कार्यक्रम के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर जा रहा था। 25 गाड़ियों में करीब 200 लोग थे।
शाम को 4 बजे काफिला जैसे ही झीरम घाटी से गुजरा, तभी नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोक दिया। कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही पेड़ों के पीछे छिपे 200 से ज्यादा नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। करीब डेढ़ घंटे तक गोलियां चलती रहीं। इसके बाद नक्सलियों ने एक-एक गाड़ी को चेक किया। जिन लोगों की सांसें चल रहीं थी उन्हें फिर से गोली मारी। जिंदा लोगों को बंधक बनाया। हमले में 32 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई। बताया जाता है कि नक्सलियों का मुख्य टारगेट बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा थे। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नक्सलियों ने कर्मा को करीब 100 गोलियां मारी थीं। बताया जाता है कि नक्सलियों ने उनके शव पर चढ़कर डांस भी किया था।