किसी महिला को तीन दिन के लिए ‘अछूत’ नहीं माना जा सकता: न्यायमूर्ति नागरत्ना

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किसी महिला को तीन दिन के लिए 'अछूत' नहीं माना जा सकता: न्यायमूर्ति नागरत्ना

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  • Publish Date - April 7, 2026 / 05:56 PM IST,
    Updated On - April 7, 2026 / 05:56 PM IST

नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी. वी. नागरत्ना ने मंगलवार को कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि किसी महिला को महीने में तीन दिन ‘अछूत’ माना जाए और फिर चौथे दिन अछूत मानना ​​बंद कर दिया जाए।

यह टिप्पणी तब आई जब नौ न्यायाधीशों की एक पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी।

इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

सुनवायी के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें 2018 के शबरिमला फैसले में की गई उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति है, जिसमें कहा गया है कि 10-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना ‘अस्पृश्यता’ का एक रूप है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन करता है।

शबरिमला मामले में, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ का मत था कि उम्र या मासिक धर्म की स्थिति के आधार पर महिलाओं को केरल के शबरिमला मंदिर में प्रवेश से रोकना ‘अस्पृश्यता’ का एक रूप है जो उन्हें ‘अधीनस्थ’ स्थिति में रखता है, ‘पितृसत्ता’ को कायम रखता है और ‘उनकी गरिमा के लिए अपमानजनक’ है।

मेहता ने कहा, ‘भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िवादिता वाला देश नहीं है जितना पश्चिम समझता है।’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तब कहा, ‘शबरिमला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 पर बहस कैसे की जा सकती है, यह मुझे समझ नहीं आता। एक महिला होने के नाते, मैं कह सकती हूं कि हर महीने तीन दिन अस्पृश्यता नहीं हो सकती और चौथे दिन कोई अस्पृश्यता नहीं होती।’’

मेहता ने कहा कि वह मासिक धर्म के मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का संबंध मासिक धर्म से नहीं है और यह प्रतिबंध केवल आयु वर्ग के आधार पर लगाया गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘स्पष्ट कर दें। शबरिमला मंदिर केवल एक विशेष आयु वर्ग के लिए है। इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। देश और दुनिया भर में भगवान अय्यप्पा के मंदिर सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले हैं। यह केवल एक मंदिर है जहां यह रोक है। यह एक अनूठा मामला है।’’

इस मामले की सुनवाई फिलहाल जारी है।

सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से शबरिमला अय्यप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था और कहा था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।

चौदह नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक अन्य पीठ ने 3:2 के बहुमत से विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।

भाषा अमित माधव

माधव