(कोमल शर्मा)
नयी दिल्ली, पांच अप्रैल (भाषा) उभयलिंगी कानून में संशोधन ने समुदाय के सदस्यों के बीच ‘नियमित निगरानी’ का डर पैदा कर दिया है और उनमें से कई ने आशंका जताई कि सत्यापन के नाम पर उन्हें बार-बार जांच, उत्पीड़न और यहां तक कि कपड़े उतारने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई उभयलिंगी (ट्रांसजेंडर) व्यक्तियों की चिंता केवल प्रमाणन के लिए मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि उन्हें डर है कि संशोधित कानून के तहत स्व-पहचान को समाप्त कर दिये जाने के बाद, उन्हें पुलिस, नियोक्ताओं, अस्पतालों और अन्य अधिकारियों के सामने बार-बार अपनी लैंगिक पहचान ‘‘साबित’’ करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
संसद ने उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च को पारित किया था और 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उसे अपनी मंजूरी दे दी।
रितु नाम की ‘नॉन-बाइनरी ट्रांसफेमिनिन’ ने कहा कि यह कानून उभयलिंगी व्यक्तियों को जीवन के हर चरण में जांच और उत्पीड़न का शिकार बना सकता है। उसने कहा, ‘‘सिर्फ मेडिकल पैनल ही नहीं, बल्कि जिस तरह से यह उभयलिंगी लोगों को संदिग्ध बनाता है – उस परिस्थिति में उन्हें निर्वस्त्र किया जा सकता है या पुलिस द्वारा परेशान किया जा सकता है।’’
उसने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘किसी भी दिन, कार्यस्थल पर, अस्पताल में या कहीं और भी आपकी पहचान को चुनौती दी जा सकती है। यह कोई एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं है, यह एक नियमित निगरानी है जिसका सामना समुदाय सदियों से करता आ रहा है।’’
हालांकि, एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने नयी प्रमाणीकरण प्रक्रिया का बचाव करते हुए तर्क दिया कि स्व-पहचान का दुरुपयोग हो सकता है और किसी न किसी प्रकार का सत्यापन आवश्यक है।
अधिकारी ने कहा, ‘‘कल्पना कीजिए कि किसी ने एक महिला का बलात्कार किया है और पुलिस के सामने कहता है कि वह तो स्वघोषित उभयलिंगी है, इसलिए वह बलात्कार नहीं कर सकता।’’
एशिया-प्रशांत क्षेत्र से संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देने वाले पहले उभयलिंगी व्यक्ति लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने के उद्देश्य से उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसका लक्ष्य नालसा (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण) के फैसले को लागू करवाना है।
नालसा का 2014 का फैसला भारत में उभयलिंगी लोगों को ‘तृतीय लिंगी’ के रूप में मान्यता देने वाला उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय था। इस निर्णय ने चिकित्सकीय परीक्षण के बिना स्वयं को पुरुष, महिला या तीसरे लिंग के रूप में पहचानने के अधिकार को बरकरार रखा था और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत समानता और गरिमा के मौलिक अधिकारों की पुष्टि की थी।
राकांपा (शप) नेता अनीश गावंडे ने मेडिकल बोर्ड और जिला अधिकारियों द्वारा प्रमाणन की आवश्यकता की आलोचना की।
उन्होंने, ‘‘पिछले सप्ताह मुझे लोगों के बहुत से फोन आए हैं – कि मेरा क्या होगा, मुझे पुलिस गिरफ़्तार कर लेगी क्या, मैं अगर ट्रांसजेंडर हूं तो मुझे सर्जरी करवानी ही पड़ेगी क्या?
भाषा राजकुमार सुभाष
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