नयी दिल्ली, 20 सितंबर (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार को दावा किया कि मोदी सरकार के अरावली को फिर से परिभाषित करने के फैसले से इस पर्वत शृंखला पर “सबसे बड़ा खतरा” मंडरा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि उच्चतम न्यायालय की ओर से बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति केंद्र के इस कदम को खारिज कर देगी।
रमेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अरावली को फिर से परिभाषित करने पर “आमादा” है। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के मजबूती से खड़े रहने की उम्मीद करते हैं।
रमेश की यह टिप्पणी अरावली में खनन से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में ‘पीटीआई’ की तीन हिस्सों वाली रिपोर्ट के बाद आई है।
उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “खनन, रियल एस्टेट और अन्य परियोजनाओं की अनुमति देने के लिए अरावली को फिर से परिभाषित करने के मोदी सरकार के कदमों से इस पर सबसे गंभीर खतरा मंडरा रहा है। भारत के प्रधान न्यायाधीश के नौ फरवरी 2027 को सेवानिवृत्त होने से पहले, हमें शायद पता चल जाएगा कि इन कदमों का क्या होता है। उम्मीदें टिकी हुई हैं।”
कांग्रेस नेता ने कहा, “उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय की ओर से स्थापित उच्चाधिकार प्राप्त समिति, जिसे अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 30 नवंबर 2026 की समयसीमा दी गई है, अरावली को फिर से परिभाषित करने के मोदी सरकार के कदमों को खारिज कर देगी। वरना, पर्यावरण विनाश की ऐसी और भी घटनाएं होंगी।”
जानकारों के मुताबिक, अरावली की पहाड़ियों में मौजूद प्राकृतिक दरारों और खांचों की वजह से इनमें हर साल प्रति हेक्टेयर 20 लाख लीटर पानी जमीन के अंदर पहुंचाने की क्षमता है।
अरावली की पहाड़ियां दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई हैं, लेकिन इनमें दशकों से हो रहे खनन का काफी प्रतिकूल असर पड़ा है।
‘पीटीआई’ ने पिछले महीने रिपोर्ट दी थी कि अरावली में खनन का राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ और सीकर जिलों पर क्या असर पड़ा है। इसमें यह भी बताया गया था कि अरावली में खनन से निकलने वाली धूल वहां के निवासियों की जान कैसे ले रही है।
भाषा नेत्रपाल पारुल
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