नयी दिल्ली, 21 मई (भाषा) भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से कई केंद्रों पर किए गए परीक्षण में पाया गया है कि आयरन की कमी (एनीमिया) के उपचार में उपयोग किए जाने वाले दो ‘आयुर्वेदिक फार्मूलेशन’ मध्यम एनीमिया से पीड़ित महिलाओं के इलाज में चिकित्सीय रूप से मानक ‘आयरन-फॉलिक एसिड सप्लीमेंट’ के समान असरदार हैं।
तीसरे चरण के नियंत्रित परीक्षण के निष्कर्ष आईसीएमआर द्वारा 20 मई को ‘अंतरराष्ट्रीय नैदानिक परीक्षण दिवस: एकीकृत चिकित्सा नैदानिक परीक्षणों पर जोर’ विषय के तहत आयोजित ‘प्रथम आईसीएमआर वार्षिक नैदानिक परीक्षण सम्मेलन 2026’ के दौरान प्रस्तुत किए गए।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस अध्ययन में भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या, आयरन की कमी से जुड़े एनीमिया के प्रबंधन में आयुर्वेदिक फार्मूलेशन – पुनर्नवादि मंडूरा अकेले और द्राक्षवलेहा के साथ संयोजन में – की प्रभावकारिता का मूल्यांकन पारंपरिक आयरन-फॉलिक एसिड के मुकाबले किया गया।
यह परीक्षण मध्यम एनीमिया से पीड़ित 18-49 आयु वर्ग की लगभग 4,000 गैर-गर्भवती महिलाओं पर किया गया। अनुसंधानकर्ताओं ने 90 दिन की अवधि में हीमोग्लोबिन के स्तर और अन्य नैदानिक परिणामों का आकलन किया।
बयान में कहा गया कि निष्कर्षों से पता चला है कि आयुर्वेदिक उपचार का चिकित्सीय प्रभाव मानक ‘आयरन-फॉलिक एसिड सप्लीमेंट’ के बराबर है।
राष्ट्रीय स्तर की इस बैठक में नीति निर्माता, वैज्ञानिक, चिकित्सक, अनुसंधानकर्ता, नियामक प्राधिकरण और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ भारत के नैदानिक परीक्षण तंत्र को मजबूत करने और साक्ष्य-आधारित एकीकृत चिकित्सा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए।
कार्यक्रम में आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल और केंद्रीय आयुष सचिव राजेश कोटेचा सहित स्वास्थ्य सेवा और वैज्ञानिक समुदाय के अन्य विशेषज्ञ एवं हितधारक उपस्थित थे।
बैठक को संबोधित करते हुए, गणमान्य व्यक्तियों ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने और स्वास्थ्य सेवा वितरण को मजबूत करने के लिए सुदृढ़ नैदानिक अनुसंधान प्रणालियों, नैतिक शासन और एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों के वैज्ञानिक सत्यापन के महत्व पर जोर दिया।
इस कार्यक्रम के दौरान, आईसीएमआर ने ‘भारत में प्रथम-मानव चरण 1 नैदानिक परीक्षणों को आगे बढ़ाना: नियामक मार्गों और अवसरों पर एक डेल्फी अध्ययन’ शीर्षक से एक रिपोर्ट भी जारी की।
दवा उद्योग, संविदा पर काम करने वाले अनुसंधान संगठनों, शिक्षाविदों और राष्ट्रीय नियामक एजेंसियों के 37 विशेषज्ञों को शामिल करते हुए दो दौर के परामर्श के माध्यम से तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत में प्रारंभिक चरण के नैदानिक परीक्षणों को आगे बढ़ाने में आने वाली बाधाओं की पहचान की गई है।
भाषा संतोष नेत्रपाल
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