बांग्लादेश ने इस्लामी कट्टरपंथी के खिलाफ मतदान किया; तारिक रहमान से उम्मीदें हैं : तस्लीमा नसरीन

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बांग्लादेश ने इस्लामी कट्टरपंथी के खिलाफ मतदान किया; तारिक रहमान से उम्मीदें हैं : तस्लीमा नसरीन

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  • Publish Date - March 7, 2026 / 06:17 PM IST,
    Updated On - March 7, 2026 / 06:17 PM IST

(शंकर घोष)

नयी दिल्ली, सात मार्च (भाषा) बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा कि हाल के चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को मिली भारी जीत पार्टी की लोकप्रियता से कहीं अधिक इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता से दूर रखने के लिए जनता के दृढ़ संकल्प को दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे “पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथियों” का प्रमुख विपक्षी दल होना भी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील मूल्यों के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

नसरीन ने ‘पीटीआई वीडियो’ को बताया, “आप जमात की रैलियों में भारी भीड़ देखते हैं। लेकिन इसका असर वोटों पर नहीं पड़ा है। बीएनपी के शानदार नतीजे बांग्लादेशी जनता के उस दृढ़ संकल्प को दर्शाते हैं कि वे जमात जैसे पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथियों को सत्ता में नहीं आने देंगे। इसके अलावा, अवामी लीग की अनुपस्थिति ने कई मतदाताओं के लिए बीएनपी को एकमात्र व्यवहार्य विकल्प बना दिया।”

तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी ने फरवरी 2026 में निर्णायक जनादेश प्राप्त किया, जिसमें उसने 298 सीट में से 209 सीट जीतीं। उसके सहयोगियों ने तीन और सीट हासिल कीं, जिससे गठबंधन को 299 सदस्यीय जातीय संसद (बांग्लादेश संसद) में स्पष्ट बहुमत मिल गया।

जमात और उसके सहयोगी केवल 77 सीट ही हासिल कर सके और विपक्षी गुट बना।

“लज्जा” की लेखिका ने उम्मीद जताई कि नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में देश की राजनीतिक और कानून व्यवस्था की स्थिति में बेहतर बदलाव आएगा।

नसरीन ने कहा, “वह सबको साथ लेकर चलने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कर रहे हैं। उम्मीद है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान हिंदुओं को निशाना बनाने का जो सिलसिला चल रहा था, वह अब बंद हो जाएगा”

वर्तमान में नयी दिल्ली में रह रहीं 63 वर्षीय लेखिका ने कोलकाता जाने की अनुमति न मिलने पर खेद व्यक्त किया। वह पश्चिम बंगाल में एक लेखिका के रूप में काफी लोकप्रिय हैं।

ऑल-इंडिया माइनॉरिटी फोरम के सदस्यों द्वारा उनकी पुस्तक “द्विखंडितो” के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद, उन्हें 2008 में शहर छोड़ने और स्वीडन जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने कहा, “यह वामपंथी शासन के दौरान की बात है। लेकिन ममता बनर्जी ने भी मुझे कोलकाता लौटने की अनुमति नहीं दी है। बंगाली संस्कृति में इतनी गहराई से रचे-बसे व्यक्ति के लिए बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल से दूर रहना कष्टदायक है।”

बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यक और भारत के मुसलमानों की स्थितियों के बीच तीखा अंतर बताते हुए, नसरीन ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को “एक हिंदू के समान सभी लाभों तक समान पहुंच प्राप्त है और आवश्यकता पड़ने पर वे कानूनी सहारा ले सकते हैं”।

नसरीन ने कहा, “भारत में मुस्लिम आबादी घट नहीं रही है, और इस समुदाय का कोई भी व्यक्ति बेहतर जीवन के लिए किसी मुस्लिम देश में पलायन करने के बारे में नहीं सोचता… लेकिन क्या आप बांग्लादेश में हिंदुओं के बारे में भी यही कह सकते हैं? प्रवासन और अन्य कारणों से वर्षों से इनकी संख्या में गिरावट आई है। अक्सर, अन्याय होने पर वे उत्पीड़न के डर से अदालतों का रुख नहीं करते हैं।”

ईरान की स्थिति के बारे में बात करते हुए, नसरीन ने कहा कि वह उस “मुल्ला-तंत्र” की प्रशंसक नहीं हैं, जो महिलाओं के लिए समान अधिकारों से इनकार करता है और हिजाब को लागू करता है। हालांकि, वह अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन नहीं करती हैं, जो शासन को कमजोर करने के अलावा, सैकड़ों नागरिकों की मौत का कारण भी बना है।

उन्होंने 28 फरवरी को ईरान के मीनाब शहर के एक स्कूल पर हुए हवाई हमले का जिक्र करते हुए कहा, “किसी स्कूल पर बमबारी करके 150 से अधिक छात्राओं को मारना किस आधार पर उचित है? यदि आपकी प्रौद्योगिकी या खुफिया जानकारी इतनी गलत है, तो बेहतर है कि आप इससे दूर रहें।”

इस्लाम और कुरान के बारे में अपने विचारों के कारण इस्लामी कट्टरपंथियों से धमकियां मिलने के बाद 1994 में बांग्लादेश छोड़ने के लिए मजबूर होने के बाद से नसरीन निर्वासन में रह रही हैं।

भाषा प्रशांत दिलीप

दिलीप