बंगाल:विश्वविद्यालय शिक्षकों के तबादले की अनुमति देने वाले विधेयक पर कई शिक्षाविदों ने जताई चिंता

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बंगाल:विश्वविद्यालय शिक्षकों के तबादले की अनुमति देने वाले विधेयक पर कई शिक्षाविदों ने जताई चिंता

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  • Publish Date - September 20, 2026 / 05:30 PM IST,
    Updated On - September 20, 2026 / 05:30 PM IST

कोलकाता, 20 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल और देश के अन्य हिस्सों के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों के एक समूह ने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय (प्रशासन एवं विनियमन) (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर चिंता जताई और कहा कि इस विधेयक में विश्वविद्यालयों के बीच शिक्षकों के स्थानांतरण का प्रावधान शिक्षण, शोध और संस्थागत स्वायत्तता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने यह विधेयक 10 सितंबर को पारित किया था। शिक्षाविदों ने राज्यपाल और विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति आरएन रवि को सौंपे गए एक ज्ञापन में कहा कि प्रत्येक विश्वविद्यालय अपनी अलग अकादमिक संरचना, पाठ्यक्रम और आवश्यकताओं वाला विशिष्ट संस्थान होता है।

उन्होंने कहा कि एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में शिक्षकों के स्थानांतरण से दोनों संस्थानों का अकादमिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

पत्र की एक प्रति रविवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को उपलब्ध कराई गई।

शिक्षाविदों ने कहा कि ‘‘पाठ्यक्रम और शोध कार्यक्रम’’ विशिष्ट शिक्षकों तथा उनके विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं, जबकि विश्वविद्यालय विशेष क्षेत्रों में शोध एवं अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए प्रयोगशालाएं एवं पुस्तकालय विकसित करते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘एक संस्थान से दूसरे संस्थान में कर्मचारियों का स्थानांतरण दोनों संस्थानों के ढांचागत संतुलन को प्रभावित करेगा और उनके शिक्षण एवं शोध कार्यक्रमों में बाधा उत्पन्न करेगा।’’

शिक्षाविदों ने कहा कि अगर विशिष्ट क्षेत्रों में शोध का मार्गदर्शन करने वाले शिक्षकों का स्थानांतरण किया जाता है तो शोधार्थी विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने पत्र में कहा कि इससे छात्रों को पर्याप्त अकादमिक सहयोग नहीं मिल पाएगा और पहले से उपलब्ध प्रयोगशालाओं तथा पुस्तकालय संसाधनों का भी पूरा उपयोग नहीं हो सकेगा।

शिक्षाविदों ने शोध के लिए मिलने वाले वित्त पोषण को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि बड़ी परियोजनाएं अक्सर प्रमुख अन्वेषक के रूप में काम कर रहे विशेषज्ञ शिक्षकों की मौजूदगी से जुड़ी होती हैं।

उन्होंने कहा कि शिक्षकों के स्थानांतरण से अंतर-विषयक और बहु-संस्थागत शोध परियोजनाएं ‘‘विशेष रूप से प्रभावित’’ हो सकती हैं जबकि विशिष्ट क्षेत्रों में वरिष्ठ शिक्षकों की मौजूदगी से शोध उत्कृष्टता के स्थायी केंद्र विकसित करने में मदद मिलती है।

ज्ञापन में कई पुराने राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और संसाधनों की कमी का भी उल्लेख किया गया है।

शिक्षाविदों ने दावा किया कि इन विश्वविद्यालयों में सैकड़ों पद अब भी रिक्त हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे समय में जब ये संस्थान पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, उनके बचे हुए शिक्षकों की संख्या कम करना विशेष रूप से नुकसानदायक होगा।’’

पत्र पर अन्य लोगों के अलावा यादवपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एमेरिटस अमिता चटर्जी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व पालित प्रोफेसर (भौतिकी) अमिताभ रायचौधरी, आईआईएम कलकत्ता में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर अनूप सिन्हा, यादवपुर विश्वविद्यालय के राजा रामन्ना प्रोफेसर अनुपम बसु, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सब्यसाची बसु राय चौधरी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के पूर्व निदेशक सब्यसाची भट्टाचार्य और सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज के पूर्व निदेशक समेत अन्य लोगों के हस्ताक्षर हैं।

भाषा जितेंद्र संतोष

संतोष