सीएपीएफ विधेयक में बल के जवानों के काम की परिस्थितियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया : विपक्ष

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सीएपीएफ विधेयक में बल के जवानों के काम की परिस्थितियों के बारे में कुछ नहीं कहा गया : विपक्ष

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  • Publish Date - March 30, 2026 / 06:10 PM IST,
    Updated On - March 30, 2026 / 06:10 PM IST

नयी दिल्ली, 30 मार्च (भाषा) केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) संबंधी एक विधेयक का विरोध करते हुए विपक्षी दलों ने सोमवार को राज्यसभा में आरोप लगाया कि यह विधेयक केवल आईपीएस अधिकारियों को सीएपीएफ में नियुक्त करने के लिए लाया गया है लेकिन बल के जवानों के काम की परिस्थितियां और उनके परिवार की सुरक्षा के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया है।

कई विपक्षी दलों के सदस्यों ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे प्रवर समिति में भेजने का सुझाव दिया।

उच्च सदन में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए आम आदमी पार्टी (आप) के संदीप पाठक ने कहा कि इस विधेयक का एक ही उद्देश्य है कि आईपीएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति की एक कानूनी व्यवस्था हो।

उन्होंने कहा ‘‘यह सबसे बड़ी चूक है कि यह विधेयक पूरे संस्थान में सुधार के लिए नहीं लाया गया है।’’

उन्होंने कहा कि इस विधेयक में कई खामियों को दूर किया जा सकता था लेकिन यह विधेयक कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि एक पृष्ठभूमि के सिलसिले में लाया गया है।

पाठक ने कहा कि इसमें सीएपीएफ और पुलिस बल के बीच समन्वय की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए थी। ‘‘इसके अलावा प्रतिनियुक्ति की अवधि भी सीमित है।’’

उन्होंने कहा ‘‘सीएपीएफ के पूरे कैडर का प्रशिक्षण अलग है। ऐसे में उनके ऊपर आईपीएस अफसर को बिठा दिया जाएगा। इससे संस्थान को क्या मदद मिलेगी? सरकार को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बल में पदोन्नति की व्यवस्था आसान और समय पर हो।’’

समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने कहा कि केंद्रीय बलों के अधिकारियों को इसलिए न्यायालय जाना पड़ा क्योंकि उनकी सेवा शर्तों में भारी संगतियां थीं।

उन्होंने भी विधेयक को प्रवर समिति में भेजने की मांग की और कहा कि आईएएस एवं आईपीएस अधिकारी अपने हिसाब से नियम बना लेते हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बलों में अधिकारियों की प्रोन्नति के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते जिसके कारण कई अधिकारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले लेते हैं।

उन्होंने कहा कि बल के कर्मियों में निराशा नुकसानदेह है और यह घातक हो सकती है।

बीजू जनता दल के निरंजन बिशी ने कहा कि विधेयक से कई चिंताएं उत्पन्न होती हैं जिनका समाधान जरूरी है। उन्होंने कहा कि विधेयक में प्रौद्योगिकी और आधुनिकीकरण के बारे में कुछ नहीं कहा गया है जबकि वर्तमान हालात को देखते हुए यह बहुत जरूरी है।

उन्होंने कहा ‘‘अधिकारों का केंद्रीकरण भी एक अहम मुद्दा है। चिंता की बात यह भी है कि बल में बड़ी संख्या में पद रिक्त पड़े हैं।’’

राजद सदस्य मनोज कुमार झा ने कहा ‘‘हो सकता है कि संगठन में किसी कर्मी को सर्वोच्च पद तक पहुंचने का सौभाग्य न मिले, लेकिन यह कानूनी बाध्यता के जरिये नहीं होना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि देश से नक्सलवाद के खात्मे को लेकर चर्चा जोरों पर है लेकिन किसी को यह ध्यान नहीं है कि यह उपलब्धि सीएपीएफ के गुमनाम नायकों की वजह से हासिल हुई है जिनमें से कई ने तो अपने प्राण भी गंवा दिए।

बीआरएस के रविचंद्र वद्दिराजू ने कहा कि विधेयक में बल के जवानों की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं कहा गया है क्योंकि ये जवान लंबे समय तक परिवारों से दूर रह कर, विषम परिस्थितियों में काम करते हैं।

शिवसेना (उबाठा) के संजय राउत ने कहा कि यह विधेयक केवल सामान्य प्रशासन से जुड़ा नहीं है बल्कि यह संविधान के प्रावधानों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक बल के अधिकारों को नियंत्रित करने के लिए है।

कांग्रेस सदस्य विवेक के तन्खा ने कहा ‘‘विधेयक का कोई उद्देश्य नजर नहीं आ रहा है। सच बात तो यह है कि बल में आईजी के 18 पद रिक्त हैं लेकिन आईपीएस अधिकारी इन पदों पर प्रतिनियुक्ति पर जाना नहीं चाहते।’’

उन्होंने कहा कि जो बल सीमा की सुरक्षा, कश्मीर, लेह, लद्दाख की व्यवस्था और नक्सल प्रभावित इलाकों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, हमें उनके अधिकार नहीं छीनने चाहिए।

भाजपा के सुभाष बराला ने कहा कि देश में उत्पन्न विषम हालात में यह बल संकट मोचक की भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि विधेयक का उद्देश्य बल में भर्ती में एकरूपता लाना, विरोधाभासों को समाप्त करते हुए भर्ती के लिए एकीकृत कानूनी व्यवस्था तैयार करना और सेवा शर्तों को स्पष्ट करना है।

कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि यह विधेयक केंद्रीय सशस्त्र बलों का मनोबल तोड़ देगा क्योंकि इसमें मुखिया बल के बजाय बाहर का होगा और निर्णय वही लेगा।

चर्चा अधूरी रही।

भाषा

मनीषा अविनाश

अविनाश