नयी दिल्ली, 30 मार्च (भाषा) केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने सोमवार को कहा कि नयी दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) व देहरादून स्थित सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो फसल अवशेष को बायो-बिटुमेन में तब्दील कर सकती है और इससे भारत को आयात पर सालाना खर्च होने वाली 40,000 करोड़ रुपये राशि बचाने तथा वायु प्रदूषण से निपटने में मदद मिल सकती है।
बायो-बिटुमेन तकनीक थर्मोकेमिकल (पायरोलिसिस) प्रक्रिया के तहत धान के भूसा और अन्य फसल अवशेषों का इस्तेमाल कर एक नवीकरणीय बाइंडर का उत्पादन करती है।
परीक्षण के दौरान इसके सफल अनुप्रयोग पहले ही देखे जा चुके हैं, जिनमें सड़क खंडों का निर्माण शामिल है।
सिंह ने कहा, “पारंपरिक बिटुमेन को आंशिक रूप से भी बायो-बिटुमेन से बदलने से आयात पर निर्भरता में काफी कमी आएगी, आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और यह सुनिश्चित होगा कि बुनियादी ढांचे का विकास वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों से अप्रभावित रहे।”
पारंपरिक बिटुमेन कच्चे तेल का एक उप उत्पाद है, जिसमें हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है।
इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण के लिए बाइंडर के रूप में किया जाता है।
भारत में सालाना लगभग 88 लाख टन बिटुमेन की खपत होती है, जिसमें से लगभग 50 से 58 प्रतिशत आयात किया जाता है, जिसकी लागत 25,000 करोड़ रुपये से 30,000 करोड़ रुपये तक होती है।
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