नयी दिल्ली, 29 जून (भाषा) केंद्र ने पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा की 15,000 घटनाएं होने और उनमें 25 लोगों के मारे जाने तथा 7,000 महिलाओं से छेड़खानी किये जाने का दावा करने वाली एक तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट पर मंगलवार को कार्रवाई करने का वादा किया।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी के मुताबिक सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) प्रमोद कोहली के नेतृत्व वाले नागरिक समाज समूह -कॉल फॉर जस्टिस- की रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव बाद हिंसा पूरे पश्चिम बंगाल में कई गांवों और शहरों में हुई, जिसकी शुरूआत एक साथ दो मई की रात को हुई, जब विधानसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा की गई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘यह एक स्पष्ट संकेत है कि ज्यादातर घटनाएं छिटपुट नहीं थी, बल्कि पूर्व निर्धारित, योजनाबद्ध और षडयंत्र के तहत थीं।’’
पांच सदस्यीय दल में दो आईएएस अधिकारी और एक आईपीएस अधिकारी भी शामिल थे।
रेड्डी ने समूह की रिपोर्ट उन्हें सौंपे जाने पर संवाददाताओं से कहा, ‘‘गृह मंत्रालय रिपोर्ट का अध्ययन करेगा और उसकी सिफारिशें लागू करने की कोशिश करेगा।’’
रिपोर्ट, पांच सदस्यीय दल द्वारा पश्चिम बंगाल का दौरा करने और वहां के विभिन्न तबकों के लोगों से मिलने के बाद तैयार की गई है। रेड्डी ने रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य के 16 जिले चुनाव बाद हिंसा से प्रभावित हुए थे।
उन्होंने कहा, ‘‘रिपेार्ट में कहा गया है कि चुनाव बाद हिंसा के चलते कई लोगों ने बंगाल में अपना घर-बार छोड़ दिया और असम, झारखंड तथा ओडिशा में शरण ली। ’’
रिपोर्ट के मुताबिक पहले से पुलिस रिकार्ड में मौजूद कुछ दुर्दांत अपराधियों, माफिया डॉन और आपराधिक गिरोहों ने कथित तौर पर ‘‘जानलेवा हमलों का नेतृत्व किया और बेरोक-टोक अंजाम दिया, (जो) यह खुलासा करता है कि चुनाव से पहले भी स्पष्ट रूप से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था और इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खामोश करने के लिए किया गया।’’
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनिंदा तरीके से आवासीय एवं वाणिज्यिक संपत्ति को नष्ट करना और तोड़फोड़ करने का एकमात्र उद्देश्य लोगों को उनकी आजीविका से वंचित करना तथा उन्हें आर्थिक रूप से पंगु करना था।
इसमें दावा किया गया है कि सबसे बुरी तरह से वे लोग प्रभावित हुए जो दैनिक आधार पर काम या कारोबार करते थे, जिन्हें वित्तीय संकट में डाल दिया गया।
रिपोर्ट में दावा किया गया है, ‘‘ज्यादातर मामलों में पीड़ित पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने से डर रहे थे। ऐसा या तो उन्हें बदला लिये जाने के डर को लेकर था या फिर उन्हें पुलिस पर विश्वास नहीं था। ’’
इसमें दावा किया गया है, ‘‘जिन लोगों ने साहस जुटाया और रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गये, उन्हें पुलिस ने दोषियों के साथ सुलह करने के लिए या तो लौटा दिया या मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। ’’
तथ्यान्वेषी दल ने रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय के समक्ष रखे जाने का सुझाव दिया है।
दल ने कहा, ‘‘प्रचुर एवं ठोस साक्ष्यों के आलोक में उच्चतम न्यायालय एक विशेष जांच दल (एसआईटी) फौरन गठित करने पर विचार कर सकता है और इसके कार्य की निगरानी शीर्ष न्यायालय के एक मौजूदा न्यायाधीश या सेवानिवृत्त न्यायाधीश से करा सकता है, ताकि निष्पक्ष जांच हो और शीघ्र न्याय मिले। ’’
दल ने यह सुझाव भी दिया है कि केंद्र सरकार को कर्तव्य में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए।
भाषा सुभाष माधव
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