ईटानगर, 18 जनवरी (भाषा) कांग्रेस की अरुणाचल प्रदेश इकाई के अध्यक्ष बोसिराम सिरम ने रविवार को केंद्र सरकार से मनरेगा का नाम बदलने और नया कानून लागू करने के फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस कदम से योजना का अधिकार-आधारित स्वरूप कमजोर होता है और ग्रामीण श्रमिकों के हकों का हनन होता है।
सिरम ने लोअर दिबांग घाटी जिले के रोइंग में मनरेगा बचाओ संग्राम जागरूकता कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि योजना का नाम बदलकर विकसित भारत गारंटी रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जीरामजी) करना ‘राजनीतिक, वैचारिक एवं खतरनाक’ है और इसका उद्देश्य महात्मा गांधी से जुड़ी विरासत को मिटाना है।
उन्होंने पार्टी द्वारा जारी एक बयान में कहा कि मनरेगा संसद द्वारा एक अधिकार-आधारित कानून के रूप में पारित किया गया था और यह किसी भी सरकार की निजी संपत्ति नहीं है कि वह मनमाने ढंग से इसका नाम बदल दे।
प्रदेश कांग्रेस प्रमुख ने दावा किया कि योजना की संरचना में बदलाव से इसकी कानूनी गारंटी कमजोर हो गई है।
उन्होंने पूछा, “पहले, प्रत्येक श्रमिक को 100 दिनों के रोजगार की मांग करने का कानूनन गारंटीकृत अधिकार था। अब सब कुछ बजट आवंटन पर निर्भर करता है। गारंटी कहां है? अधिकार कहां है?”
सिरम ने 60 दिनों के मानसून विराम की भी आलोचना करते हुए कहा कि मानसून का मौसम किसानों और आदिवासी समुदायों के लिए कठिनाई का समय होता है, इस दौरान काम रोकना अनुचित है।
उन्होंने एआई-आधारित निगरानी, बायोमेट्रिक उपस्थिति एवं ‘जियो-टैगिंग’ पर भी चिंता व्यक्त की और तर्क दिया कि ऐसे उपाय दूरदराज के क्षेत्रों में गरीब मजदूरों को सशक्त बनाने के बजाय उन्हें बाहर कर देते हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा, “प्रौद्योगिकी को सुविधा प्रदान करने वाला साधन होना चाहिए, न कि उत्पीड़न और बहिष्कार का उपकरण।”
सिरम ने कांग्रेस पार्टी के रुख को दोहराते हुए मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने की मांग की।
भाषा जितेंद्र राजकुमार
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