अदालत ने सोपोर में ली गई भूमि के लिए मालिकों को किराया देने का सेना को दिया निर्देश

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अदालत ने सोपोर में ली गई भूमि के लिए मालिकों को किराया देने का सेना को दिया निर्देश

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  • Publish Date - July 2, 2026 / 08:22 PM IST,
    Updated On - July 2, 2026 / 08:22 PM IST

श्रीनगर, दो जुलाई (भाषा) जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने सोपोर में सेना द्वारा ली गई और सुरक्षा कारणों से अनुपयोगी बन गई भूमि के मालिकों को किराया देने का बृहस्पतिवार को निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति संजय धर ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए सेना को सोपोर के जलालाबाद क्षेत्र में आधिकारिक उपयोग के लिए अस्थायी रूप से ली गई लगभग तीन एकड़ भूमि के लिए किराया आकलन समिति द्वारा निर्धारित दरों पर भुगतान करने को कहा, जबकि सेना का कहना था कि उसने केवल 0.75 एकड़ भूमि ली है।

मामले के अनुसार, सेना ने वर्ष 2011 में 23 कनाल 14 मरला (लगभग तीन एकड़) भूमि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से अपने कब्जे में ली थी।

यह भूमि मूल रूप से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) द्वारा उपयोग के लिए ली गई थी, जिसे बाद में सीआरपीएफ को सौंप दिया गया और फिर यह सेना के पास आ गई।

भूमि मालिकों ने दावा किया कि उन्हें सेना की ओर से किराया नहीं दिया गया, जबकि सेना का कहना था कि वह केवल 6 कनाल (3,035 वर्ग मीटर) और 6 मरला (25.29 वर्ग मीटर) भूमि पर ही काबिज है।

मालिकों ने अदालत को यह भी बताया कि उन्हें बाकी भूमि तक पहुंच से वंचित कर दिया गया है, जिसे सुरक्षा कारणों से सेना ने कंटीले तारों से घेर रखा है।

न्यायमूर्ति धर ने कहा कि यह स्थापित हो चुका है कि सेना ने केवल 6 कनाल और 6 मरला भूमि ली थी, लेकिन यह भी साबित हुआ है कि बाकी भूमि तक मालिकों की पहुंच सेना द्वारा रोक दी गई है।

अदालत ने कहा, ‘‘इस प्रकार, सेना उस भूमि के 17 कनाल 8 मरला हिस्से के लिए भी मुआवजा देने के लिए बाध्य है, जो उपयोग के लिए ली गई जमीन से बाहर है।’’

अदालत ने कहा कि मुआवजे की राशि उसी किराया दर के आधार पर तय की जाएगी, जो अधिग्रहित भूमि के लिए सेना द्वारा पहले से दी जा रही है।

भाषा अमित माधव

माधव