नई दिल्ली : Vande Bharat देश की राजनीति में इस वक्त परिसीमन के मुद्दे ने एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। केंद्र सरकार की योजना संसद के विशेष सत्र में परिसीमन संशोधन विधेयक पेश करने की है, जिसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 की जा सकती है। लेकिन, विकास की इस नई इबारत पर दक्षिण भारत के राज्यों ने विरोध का मोर्चा खोल दिया है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे सीधे तौर पर दक्षिण के राज्यों को सजा देने जैसा बताया है। स्टालिन का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी नियमों का पालन किया, क्या अब उनकी संसद में भागीदारी कम कर उन्हें दंडित किया जाएगा? स्टालिन ने कल पूरे तमिलनाडु में काले झंडे फहराकर विरोध करने का ऐलान किया है और केंद्र को भारी कीमत चुकाने की चेतावनी दी है।
दूसरी ओर, बीजेपी ने इसे केवल राजनीति करार दिया है। तमिलनाडु के पूर्व BJP अध्यक्ष के अन्नामलाई का कहना है कि सीएम स्टालिन हार के डर से जनता को गुमराह कर रहे हैं।
साल 1971 की जनगणना है, जिसके आधार पर अब तक सीटें तय थीं। अब जब देश की आबादी 1.4 अरब के पार है, तो केंद्र इसे नए सिरे से लागू करना चाहता है।
तमिलनाडु की लोकसभा सीटें वर्तमान 39 से बढ़कर लगभग 50 हो सकती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व 80 से बढ़कर लगभग 143 हो सकता है, जिससे संसद में सत्ता का संतुलन काफी हद तक बदल जाएगा। लेकिन सवाल वही है क्या उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व बढ़ने से दक्षिण की आवाज दब जाएगी? या फिर केंद्र कोई ऐसा बीच का रास्ता निकालेगा जिससे विकास और लोकतंत्र, दोनों का संतुलन बना रहे?
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