अहमदाबाद, तीन अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश विक्रम नाथ ने शुक्रवार को कहा कि प्रौद्योगिकी ने संवैधानिक संस्थाओं की जगह नहीं ली है, बल्कि उस माहौल को बदल दिया है, जिसमें उनकी वैधता स्थापित होती है। उन्होंने कहा कि डिजिटल एकीकरण अब सिर्फ़ एक ‘अतिरिक्त चीज’ नहीं, बल्कि एक प्रक्रियागत नियम बन गया है।
वह यहां ‘डिजिटल गणराज्य में मुक्त न्याय’ विषय पर 21वां न्यायमूर्ति पी.डी. देसाई स्मृति व्याख्यान दे रहे थे।
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अदालती कार्यवाही के इंटरनेट के माध्यम से सीधे प्रसारण से व्यवस्था के अंदर जवाबदेही मजबूत होती है, आम लोगों तक पहुंच बढ़ती है, संस्था अपने लोगों से जुड़ी रहती है, और यह भारत में कानूनी साक्षरता को बेहतर बनाने का सबसे असरदार जरिया बन सकती है।
उन्होंने कहा, ‘‘आज नागरिक फोन और सोशल मीडिया मंचों के जरिये सीखते हैं, परिचर्चा करते हैं, आलोचना करते हैं और हिस्सा लेते हैं। सार्वजनिक जवाबदेही अब तेजी से डिजिटल क्षेत्रों में आकार ले रही है। प्रौद्योगिकी ने संवैधानिक संस्थाओं की जगह नहीं ली है, लेकिन इसने उस माहौल को बदल दिया है जिसमें उनकी वैधता आकार लेती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अगर प्रौद्योगिकी गरिमा और निष्पक्षता से समझौता किए बिना ‘पब्लिक गैलरी’ का विस्तार कर सकती है, तो खुलापन उस संवैधानिक वादे के और करीब आ जाता है, जिसका लाभ आम नागरिक उठा सकते हैं। एक बार जब खुलापन तकनीक के माध्यम से पहुँचने योग्य हो जाता है, तो असली सवाल यह है कि हम इसे जिम्मेदारी से कैसे डिज़ाइन करें।’’
उन्होंने बताया कि कोई भी संवैधानिक विचार तभी सार्थक होता है, जब वह संस्थागत प्रवृत्ति में बदल जाए।
न्यायमूर्ति नाथ उस समय गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे, जब 26 अक्टूबर 2020 को कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अदालत की कार्यवाही का यूट्यूब पर सीधा प्रसारण शुरू किया गया था। ऐसा करने वाला यह देश का पहला उच्च न्यायालय था। इसके बाद जुलाई 2021 में पूरी अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग भी शुरू कर दी गई।
भाषा वैभव सुरेश
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