उन्नीसवीं सदी के हिंदुस्तान से रूबरू करा रही हैं एमिली ईडन की तस्वीरें

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उन्नीसवीं सदी के हिंदुस्तान से रूबरू करा रही हैं एमिली ईडन की तस्वीरें

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  • Publish Date - July 15, 2026 / 04:05 PM IST,
    Updated On - July 15, 2026 / 04:05 PM IST

नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) भारत में ब्रिटिश राज के दौरान सन 1837 में गवर्नर-जनरल रहे जॉर्ज ईडन के साथ उनकी बहन एमिली ईडन ने कलकत्ता (अब कोलकाता) से लाहौर तक की यात्रा की थी और उस दौर के हिंदुस्तान को अपने कैनवास पर उतारा था जिससे रूबरू होने का मौका लोगों को यहां की डीएजी की विथिका में मिल रहा है।

जॉर्ज ईडन की इस यात्रा का उस समय राजनीतिक महत्व था, लेकिन इसे 19वीं सदी के भारत के बारे में युवा चित्रकार एमिली द्वारा बनाए गए जीवंत और बारीकियों से भरे चित्रों के लिए भी उतना ही याद किया जाता है।

एमिली ने अपने चित्रों में घरेलू सहायकों, अफ़गान और सिख रईसों, अलग-अलग दरबारों के राजकुमारों और सिख साम्राज्य के पहले महाराजा रणजीत सिंह को जगह दी और इसके जरिये देश के पूर्वी तटों से लेकर उत्तर-पश्चिमी सीमाओं तक का दस्तावेजीकरण किया है।

एमिली ने दो दर्जन से ज्यादा तस्वीरें बनायीं जिन्हें बाद में ‘लिथोग्राफ’ (अश्ममुद्रण) के तौर पर उकेरा गया और 1844 में ‘‘पोर्ट्रेट्स ऑफ द प्रिंसेस एंड पीपल ऑफ इंडिया’ के रूप में प्रकाशित किया गया। अब ये तस्वीरें यहां डीएजी में ‘प्रिंसेस एंड पीपल ऑफ इंडिया: पोर्ट्रेट्स बाय एमिली ईडन’’ प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। इसके साथ ही, ईडन परिवार के अभिलेखागार और लाहौर कंपनी स्कूल की पेंटिंग जैसे दुर्लभ संग्रह भी कलाप्रेमियों के लिए प्रदर्शित किए गए हैं।

कला इतिहासकार और लेखिका मैरी एन प्रायर द्वारा तैयार की गई यह प्रदर्शनी, ईडन के प्रकाशित हुए कार्यों, व्यक्तिगत संग्रहों और पंजाब से जुड़ी चीज़ों को एक साथ लाती है। इससे कलाकार और उनके द्वारा दस्तावेजीकरण की गई दुनिया, दोनों की बेहतर समझ मिलती है।

डीएजी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ)और प्रबंध निदेशक आशीष आनंद ने एक बयान में कहा, ‘‘19वीं सदी के भारत के दृश्यकला इतिहास में एमिली ईडन की एक खास जगह है। उनके बनाए पोर्ट्रेट न सिर्फ अपनी कलात्मक खूबी के लिए, बल्कि उन लोगों की विविधता के लिए भी उल्लेखनीय हैं जिन्हें उन्होंने चित्रित किया। एमिली ने शासकों और सैन्य कमांडर से लेकर रास्ते में मिले सहायकों, कारीगरों और समुदायों तक को चित्रित किया।’’

बयान के मुताबिक इस प्रदर्शनी में ईडन के 1836 (जब वह कलकत्ता पहुंचीं) से लेकर 1842 (जब वह स्वदेश के लिए रवाना हुईं) तक के काम शामिल हैं।

प्रदर्शनी को लेकर प्रकाशित विषय पुस्तिका के मुताबिक ईडन परिवार चार मार्च, 1836 को कलकत्ता पहुंचा और गवर्नर-जनरल का उद्देश्य ‘‘उत्तर-पश्चिम में ब्रिटिश भारतीय इलाके पर रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने की ईस्ट इंडिया कंपनी की रणनीति को अमली जामा पहनाना’’ था।

किताब के मुताबिक लगभग 2,700 किलोमीटर की इस यात्रा में ईडन परिवार के साथ अनुमानित तौर पर 12,000 पुरुष, महिलाएं और बच्चे थे। यह दल वाराणसी, पटना, दिल्ली, ग्वालियर, लखनऊ, इलाहाबाद (प्रयागराज), अमृतसर और शिमला जैसे शहरों में छावनियों, गोदामों, अफीम की फैक्टरियों और हथियार बनाने वाली जगहों से गुजरा।

एमिली ने उन लोगों के चित्र बनाए जिनसे वह मिली थीं। उनके चित्रों के विषयों में अफगान और सिख रईस, अकाली और पहाड़ी लोग, फकीर, घरेलू सहायक और शिकार में मदद करने वाले लोग शामिल थे। उन्होंने हर उस शख्स को अपने तस्वीरों मे जगह दी जिसने उनका ध्यान खींचा फिर चाहे वह युवा हो या वृद्ध।

गवर्नर-जनरल की उत्तर की ओर यात्रा का उद्देश्य महाराजा रणजीत सिंह के साथ गठबंधन को मजबूत करना था, जो ईडन के अनुसार, ‘‘देश में दिलचस्पी पैदा करने वाले एकमात्र भारतीय शासक’’ थे।

बीमार महाराजा की तस्वीर इस दौर में एमिली ईडन की सबसे मशहूर रचना बन गई। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु 1839 में हुई थी।

किताब में क्यूरेटर लिखती हैं, ‘‘एमिली ने उन्हें किनारे से दिखाया है। उन्होंने सादे कपड़े पहने हैं और अपनी चांदी की कुर्सी पर बैठे हैं, एक पैर कुर्सी पर और दूसरा पांवदान पर टिका है, उनका बायां हाथ उठा हुआ है और तर्जनी उंगली इशारा कर रही है। एक साधारण बनावट और एक ही इशारे से एमिली का हुनर ​​दिखता है। वह न केवल अपने विषय की भौतिक बनावट को दिखाती हैं, बल्कि महाराजा की शान और उनके दबदबे को भी दिखाती हैं, जिनसे कभी बहुत से लोग खौफ खाते थे।’’

राजाओं और दरबारियों, योद्धाओं और सेवकों, यात्रियों और नौकरों के चित्रों के ज़रिए, यह प्रदर्शनी बदलाव के दौर से गुज़र रही एक दुनिया की जीवंत तस्वीर पेश करती है।

इस प्रदर्शनी की एक और खास बात ‘ईडन परिवार का अभिलेख’ है, जिसे हाल ही में डीएजी ने एंथनी ईडन की एस्टेट से हासिल किया है।

इस संग्रह में स्केचबुक, पत्रिका, पत्र-व्यवहार, मूल वॉटरकलर पेंटिंग और परिवार से जुड़े दस्तावेज़ शामिल हैं। यह संग्रह ईडन की रचनात्मक प्रक्रिया की गहरी झलक देता है और उन अनुभवों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करता है जिन्होंने उनकी कलात्मक शैली को आकार दिया।

एमिली ईडन के काम के साथ-साथ, 19वीं सदी के मध्य की ‘‘लाहौर कंपनी स्कूल’’ की पेंटिंग्स का एक दुर्लभ संग्रह भी है।

यह प्रदर्शनी एक अगस्त को समाप्त होगी।

भाषा धीरज नरेश

नरेश