उत्तराखंड में वनाग्नि उस स्थिति में नहीं जहां एसडीआरएफ, एनडीआरएफ की मदद लेनी पड़े: वन मंत्री

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उत्तराखंड में वनाग्नि उस स्थिति में नहीं जहां एसडीआरएफ, एनडीआरएफ की मदद लेनी पड़े: वन मंत्री

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  • Publish Date - May 26, 2026 / 06:35 PM IST,
    Updated On - May 26, 2026 / 06:35 PM IST

देहरादून, 26 मई (भाषा) उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने मंगलवार को कहा कि प्रदेश के जंगलों की आग उस स्थिति में नहीं पहुंची है, जहां उसे बुझाने के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ) और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की जरूरत पड़े।

देहरादून में एक संवाददाता सम्मेलन में उनियाल ने कहा कि 15 फरवरी को शुरू हुए ‘फायर सीजन’ के बाद से 24 मई तक भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की ओर से आग लगने के संबंध में जारी किए गए 3,769 अलर्ट में से केवल 529 वनाग्नि से संबंधित थे, जो कुल अलर्ट का केवल 14 फीसदी है।

उत्तराखंड में इस साल 25 मई तक वनाग्नि की कुल 394 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 331.12 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इनमें से गढ़वाल मंडल में 285 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 241.32 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि कुमांउ में 74 जगह जंगलों में आग लगी, जिनसे 64.04 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। वन्यजीव क्षेत्रों में आग लगने की 35 घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें 25.75 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।

उत्तराखंड के पांच जिले-चमोली, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ वनाग्नि से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

हालांकि, उनियाल ने कहा कि प्रदेश के अंदर कहीं भी वनाग्नि से संबंधित भयावह स्थिति नहीं है। उन्होंने कहा, “प्रभु की कृपा से हम उस कगार पर नहीं पहुंचे हैं, जहां आग बुझाने के लिए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की जरूरत पड़ती है।”

वनाग्नि बुझाने की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार, 21 से 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली एक से तीन दिन तक लगी रहने वाली आग को वन विभाग, अन्य विभागों और स्थानीय समुदायों की मदद से बुझा लिया जाता है, जबकि इससे बड़े क्षेत्रफल को प्रभावित करने वाली वनाग्नि के लिए एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और भारतीय वायु सेना की मदद लेनी पड़ती है।

उनियाल ने कहा कि वनाग्नि को लेकर डर का माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए और सही तस्वीर पेश की जानी चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड एक पर्यटन राज्य है।

मंत्री ने पिछले साल का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे उत्तराखंड धधक रहा हो, जबकि वास्तव में वनाग्नि के मामले में उत्तराखंड का देश में 14वां स्थान था। उन्होंने कहा कि पिछले साल राज्य में वनाग्नि की कुल 268 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें 310.95 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए थे।

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 से 2025 के बीच 10 साल की अवधि में प्रदेश में वनाग्नि की 14,638 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 23,682.77 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए। इस अवधि में जंगल की आग के कारण कुल 35 लोगों की मौत हुई, जबकि 76 अन्य घायल हुए।

उनियाल ने कहा कि वनाग्नि पर प्रभावी नियंत्रण के लिए पिछले चार-पांच वर्षों में वन विभाग ने कई नवाचार किए हैं, जिनमें जन सहभागिता को बढ़ावा देना, हर जिले में आग बुझाने में अच्छी भूमिका के लिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में एक लाख, 75 हजार और 51 हजार रुपये के तीन पुरस्कारों की घोषणा और हर जिले में वरिष्ठ वन अधिकारियों को नोडल अधिकारी के तौर पर तैनात करना शामिल है।

मंत्री ने कहा कि वनाग्नि शमन के लिए करीब 5,625 ‘फायर वाचर’ तैनात किए गए हैं, आग बुझाने में लगे वन कर्मियों को अग्निरोधी जैकेट तथा अन्य उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं, ‘फायर वाचर’ का दुर्घटना बीमा कवर दो लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये किया गया है तथा आग लगने के सबसे बड़े कारणों में से एक पिरूल (वीड़ की सूखी पत्तियां) एकत्रीकरण को आजीविका से जोड़ा गया है।

उनियाल ने वनाग्नि से बचाव के लिए जनजागरूकता को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हाल में वन विभाग ने 3,500 से अधिक शिविर भी लगाए। उन्होंने कहा कि 2020 में कोविड महामारी के दौरान उत्तराखंड वनाग्नि की 135 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो राज्य के गठन के बाद से सबसे कम हैं।

भाषा

दीप्ति पारुल

पारुल