नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की वकालत करते हुए सवाल उठाया कि यदि ‘नोटा’ के माध्यम से प्रयोग किया जाने वाला ‘मत न देने का अधिकार’ मौलिक अधिकार हो सकता है, तो फिर ‘मतदान का अधिकार’ मौलिक अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए।
कुरैशी ने अपनी नयी पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर’ के विमोचन से पहले ‘पीटीआई वीडियो’ से बातचीत में ये टिप्पणियां कीं। हैचेट इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक कुरैशी के जीवन के 100 संस्मरणों पर प्रकाश डालती है।
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश द्वारा पिछले महीने मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की वकालत किए जाने के बारे में पूछे जाने पर कुरैशी ने मंगलवार को कहा, ‘‘हां, बिल्कुल। यह वास्तव में हैरानी की बात है कि पिछले कई दशकों में यह मुद्दा कई बार उच्चतम न्यायालय तक गया है और हर बार अदालत ने यही माना है कि मतदान का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत प्राप्त एक वैधानिक अधिकार है। लेकिन 2013 में जब नोटा (इन विकल्पों में से कोई नहीं) पर फैसला सुनाया गया, तब यह मामला संविधान पीठ के समक्ष था और उसने कहा कि आपका ‘मत न देने’ का अधिकार एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।’’
कुरैशी ने कहा, ‘‘तो यदि ‘मत न देने’ का अधिकार मौलिक अधिकार हो सकता है, तो ‘मतदान का अधिकार’ मौलिक अधिकार क्यों नहीं हो सकता? और मेरा मानना है कि एक न्यायिक निर्णय में भी इसी बात की पुष्टि की गई थी।’’
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि उच्चतम न्यायालय मतदान के अधिकार को संवैधानिक अधिकार घोषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
कांग्रेस ने पिछले महीने मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की जोरदार वकालत करते हुए कहा था कि यह कदम मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण (एसआईआर) के तहत विभिन्न राज्यों में ‘अत्यधिक संख्या’ में मतदाताओं के नाम हटाये जाने या उन्हें जानबूझकर अयोग्य ठहराये जाने के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करने में एक सशक्त कदम होगा।
रमेश ने कहा था, ‘‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ‘इशारे पर काम कर रहे’ निर्वाचन आयोग के ‘घोर पक्षपातपूर्ण कामकाज’ के पूरी तरह उजागर होने के बाद, अब समय आ गया है कि मतदान के अधिकार को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए।’’
उन्होंने याद दिलाया था कि संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय एवं अपवर्जित क्षेत्रों पर एक सलाहकार समिति का गठन किया था। इक्कीस-22 अप्रैल, 1947 को हुई इसकी बैठक में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने पर तीखी बहस हुई थी, जिसमें डॉ. भीमराव आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम ने इसके पक्ष में पुरजोर दलीलें दी थीं।
रमेश ने कहा था कि सरदार पटेल, सी. राजगोपालाचारी और कुछ अन्य नेताओं का मानना था कि यदि मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया गया, तो रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने में झिझक सकती हैं और संविधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करना ही काफी है।
उन्होंने कहा था, ‘‘सरदार पटेल ने खुद यह रुख अपनाया था कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपने आप में एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। यही अनुच्छेद 326 की पृष्ठभूमि है, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावों का प्रावधान करता है।’’
रमेश ने कहा था कि पिछले सात दशकों से इस बात पर लगातार बहस हो रही है कि मतदान का अधिकार जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा प्रदान किया गया एक वैधानिक अधिकार है या यह एक स्पष्ट मौलिक अधिकार है।
उन्होंने कहा था, ‘‘विभिन्न दृष्टिकोण व्यक्त किए गए हैं। मार्च 2023 के ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार’ के फैसले में (शीर्ष अदालत की पीठ में शामिल) न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपनी असहमति की राय में माना था कि मतदान का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।’’
रमेश ने कहा था कि उच्चतम न्यायालय ने खुद यह स्वीकार किया है कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि, उनके वित्तीय हितों और राजनीतिक चंदा के स्रोतों को जानने का संवैधानिक और मौलिक अधिकार है।
उन्होंने तर्क दिया था, ‘‘इसने (शीर्ष अदालत ने) मत की गोपनीयता की रक्षा की है और नोटा के माध्यम से सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसलिए, यह और भी अधिक असंगत है कि मतदान का अधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार बना हुआ है। इससे मिलते-जुलते सभी अधिकारों को मौलिक घोषित कर दिया गया है, लेकिन वैसा मूल अधिकार जिसके बिना पहले वाले (अधिकार) अस्तित्व में नहीं रह सकते, वह अब भी वैधानिक (अधिकार बना) है।’’
भाषा देवेंद्र सुरेश
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