गुरुग्राम के प्रयोगशाला तकनीशियन ने लॉकडाउन के अनिश्चित दिनों को याद किया

गुरुग्राम के प्रयोगशाला तकनीशियन ने लॉकडाउन के अनिश्चित दिनों को याद किया

गुरुग्राम के प्रयोगशाला तकनीशियन ने लॉकडाउन के अनिश्चित दिनों को याद किया
Modified Date: November 29, 2022 / 08:36 pm IST
Published Date: March 23, 2021 12:10 pm IST

(कुणाल दत्त)

नयी दिल्ली, 23 मार्च (भाषा) प्रयोगशाला तकनीशियन अनंत कुमार साहा देश में लगाए गए कोविड-19 लॉकडाउन के अनिश्चित दिनों को आज भी याद करते हैं और महामारी के शुरुआती महीनों की अपनी भागमभाग भरी जिन्दगी की कहानी बयां करते हैं, जब उन्हें जांच के लिए नमूने एकत्र करने के वास्ते पूरे गुरुग्राम में घंटों तक इधर-उधर भागना पड़ता था।

इस कठिन समय में उन्हें अपनी ड्यूटी निभाते समय कुछ लोगों से अशिष्टता का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उनका कहना है कि ‘‘मानवता की सेवा की सकारात्मक भावना’’ इस तरह के ‘‘नकारात्मक घटनाक्रमों’’ पर भारी पड़ी।

राष्ट्रीय राजधानी के नजदीक गुरुग्राम में रहनेवाले और पश्चिम बंगाल के निवासी साहा ने लॉकडाउन के दिनों को याद करते हुए कहा, ‘‘शुरुआती दिनों में सबकुछ अनिश्चित था। किसी को पूरी तरह से यह पता नहीं था कि यह वायरस क्या है, और हर कोई भयभीत था। स्वास्थ्य विभाग में, अन्य प्रयोगशाला तकनीशियन नमूने एकत्र करने के लिए लोगों के घर और आवास सोसाइटियों में जाने से डरते थे।’’

हरियाणा स्वास्थ्य विभाग के कर्मी इस 37 वर्षीय तकनीशियन के जेहन में महामारी के विकराल होने, लॉकडाउन लगाए जाने और सड़कों के सुनसान हो जाने से संबंधित यादें आज भी ताजा हैं।

उन्होंने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘संक्रमण के मामलों में वृद्धि के बावजूद मैं नमूने एकत्र करने के लिए बाहर जाने को इच्छुक था। देश के लिए हमारे जवान प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते हैं, और यह भी दायित्व के लिए राष्ट्र का आह्वान था, तथा मैंने इसके लिए हामी भर दी।’’

साहा ने दावा किया कि शुरू के कुछ महीनों में उन्होंने नमूने एकत्र करने के लिए ‘‘अकेले’’ काम किया और हर रोज औसतन 50-60 नमूने तथा कई बार एक दिन में 300 तक नमूने भी एकत्र किए।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं कार में सो लिया करता था या दिन के समय कुछ आराम कर लेता था। दिनचर्या इतनी भागमभाग वाली हो गई कि संक्रमण का कोई मामला सामने आने के बाद मुझे एक तरह से घर-घर या सोसइटी-सोसाइटी भागना पड़ता था। और फिर मुझे नमूनों को उचित समय पर निर्धारित प्रयोगशालाओं में पहुंचाना पड़ता था।’’

पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले के निवासी साहा ने कहा कि उन्हें बर्फ के बॉक्स में रखे नमूनों को हरियाणा में तीन निर्धारित प्रयोगशालाओं में से नजदीक की किसी एक प्रयोगशाला में ले जाना पड़ता था।

उन्होंने कहा,‘‘इस तरह शुरुआती दिनों में, मैं नमूने एकत्र करता और उन्हें पीजीआई रोहतक, कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज करनाल या सोनीपत के खानपुर स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज पहुंचाता। प्रत्येक केंद्र एक दिन में अधिकतम 100 नमूने ही लेता था। गर्मी में पूरे दिन यात्रा करना बहुत परेशानी वाला काम था, वह भी पीपीई किट पहनकर।’’

साहा ने कहा कि तीन महीने के बाद, कुछ और प्रयोगशाला तकनीशियन इस काम में शामिल हो गए जिससे कुछ राहत मिली।

यह पूछे जाने पर कि उन्होंने अब तक कितने नमूने एकत्र किए हैं, साहा ने दावा किया, ‘‘यह 30 हजार से अधिक होने चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पिछले साल स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान मुझे तब बहुत अच्छा लगा जब हरियाणा सरकार ने मेरे प्रयासों को मान्यता दी और मुझे एक कार्यक्रम में सम्मानित किया गया।’’

महामारी के चलते पिछले साल देशभर में 25 मार्च से लॉकडाउन लगा दिया गया था।

साहा ने कहा कि उस दौरान कई मार्मिक दृश्य देखने को मिले जब परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे के पास जाने से डरने लगे थे।

उन्होंने कहा, ‘‘एक बार मुझे एक महिला डॉक्टर का नमूना लेना था जो संक्रमित पाई गई थीं और एक होटल में उन्हें पृथक रखा गया था। उन्हें अकेलेपन से लड़ने में मुश्किल हो रही थी और उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि क्या मैं उनके साथ बैठकर एक कप चाय पी सकता हूं। मैं इनकार कर सकता था, लेकिन मैंने सोचा कि यदि मैं उनके साथ बैठ जाता हूं तो उनके परेशान मस्तिष्क को कुछ राहत मिलेगी। यह एकमात्र मानवीय विकल्प था जो उस समय मेरे मन में आया।’’

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें डॉक्टर के साथ बैठकर चाय पीने में डर लगा, साहा ने कहा, ‘‘नहीं’’।

साहा ने कहा, ‘‘मैं कभी नहीं डरा, और मेरे काम के दौरान अब तक मेरी लगभग 30 बार कोविड-19 जांच हो चुकी है, तथा शुक्र है कि हर बार रिपोर्ट निगेटिव आई है।’’

भाषा

नेत्रपाल पवनेश

पवनेश


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