सांसों पर भारी खनन की धूल: अरावली में कैसे जान ले रही है जहरीली हवा

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सांसों पर भारी खनन की धूल: अरावली में कैसे जान ले रही है जहरीली हवा

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  • Publish Date - September 20, 2026 / 02:59 PM IST,
    Updated On - September 20, 2026 / 02:59 PM IST

(अलिंद चौहान)

कोटपूतली-बहरोड़/सीकर, 20 सितंबर (भाषा) राजस्थान के सीकर जिले के स्यालोदड़ा गांव में 27 वर्षीय मनीषा अपने घर की बरामदे में बिछे गद्दे पर कुछ महिलाओं के साथ बैठी हैं। बरामदे के दूसरे कोने में ऑक्सीजन के बड़े सिलेंडर रखे हैं, जिनका इस्तेमाल उनके 32 वर्षीय पति मंजीत सांस लेने के लिए करते थे और हाल ही में ‘सिलिकोसिस’ के कारण उनकी मौत हो गई।

मंजीत पास की पत्थर तोड़ने की इकाई में मजदूर थे। तीन साल से अधिक समय तक वे ‘सिलिकोसिस’ नामक लाइलाज और फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझते रहे। यह बीमारी इलाके में बड़े पैमाने पर हो रहे खनन, ड्रिलिंग, विस्फोट और पत्थर तोड़ने के दौरान निकलने वाली बारीक सिलिका धूल के लगातार सांस के साथ अंदर जाने से होती है।

अरावली पर्वतमाला के एक हिस्से स्यालोदड़ा के ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सिलिकोसिस से गांव के 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

अरावली के विभिन्न पहलुओं का आकलन करने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति ने 11 अगस्त को अपना मैदानी दौरा पूरा कर लिया, लेकिन वह स्यालोदड़ा नहीं पहुंची। कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के मुताबिक, कोटपूतली-बहरोड़ और सीकर जिलों के कई अन्य खनन प्रभावित इलाकों का दौरा भी समिति ने नहीं किया।

गृहिणी और दो छोटे बच्चों की मां मनीषा कहती हैं, ‘‘हमने पति के इलाज पर अपनी ज्यादातर बचत खर्च कर दी। फिर भी प्रशासन से कोई हमसे बात करने या मदद करने नहीं आया।’’

समिति केंद्र की उस रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा कर रही है, जिसमें अरावली की परिभाषा और उसकी सीमाएं तय करने की बात है। दशकों से जारी खनन ने इलाके में वायु प्रदूषण बढ़ाया है, जिससे खदानों में काम करने वाले लोगों और खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वालों में सांस संबंधी बीमारियां बढ़ी हैं।

समिति को 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट देनी है। रिपोर्ट में अरावली और उसके आसपास की पारिस्थितिक सीमाएं तय करने जैसे मुद्दों पर गौर किया जा सकता है। हालांकि प्रभावित लोगों में उम्मीद कम है, खासकर तब जब उच्चतम न्यायालय ने समिति की रिपोर्ट जमा करने की समयसीमा छह महीने बढ़ाने का अनुरोध ठुकरा दिया। पहले यह समयसीमा 31 अगस्त थी।

मनीषा के घर से कुछ कदम दूर रहने वाले 43 वर्षीय संजय ने इसी साल जुलाई में अपने भाई मनोज को खो दिया। मनोज भी पत्थर तोड़ने की इकाई में काम करते थे और सिलिकोसिस से ही उनकी मौत हुई। संजय के परिवार के छह सदस्य अब तक इस बीमारी की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं।

संजय ने कहा, ‘‘हमारे पास कहीं और जाकर रहने के पैसे नहीं हैं। मेरे बच्चों को भी यहीं रहकर वही जहरीली हवा में सांस लेनी पड़ती है, जिसने इतने लोगों की जान ले ली।’’

वर्ष 2023 में ‘जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरमेंटल मेडिसिन’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने राजस्थान में पत्थर तोड़ने और बलुआ पत्थर खनन से जुड़े लोगों में सिलिकोसिस के मामलों का अध्ययन किया था। उस समय राजस्थान सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर सिलिकोसिस के 23,436 मामले प्रमाणित किए गए थे, जिनमें 6,876 मौतें शामिल थीं। 4,977 मामलों के विश्लेषण में 741 मौतें शामिल थीं।

अध्ययन में पाया गया कि जहां पत्थर तोड़ने का काम अधिक होता है, वहां सिलिकोसिस की दर भी अधिक है। 36 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में बीमारी का प्रसार सबसे ज्यादा पाया गया।

हालांकि, पर्यावरणविद् कैलाश मीणा का कहना है कि ये आंकड़े बीमारी के वास्तविक बोझ को नहीं दर्शाते। उनके मुताबिक, सिलिकोसिस का प्रमाणपत्र हासिल करना ही लोगों के लिए बड़ी चुनौती है। इसके लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल में जांच और छाती का एक्स-रे कराना पड़ता है।

मीणा ने कहा, ‘‘मरीजों और उनके परिवारों को कई बार अस्पताल जाना पड़ता है। बहुत से लोग इतनी बार आने-जाने का खर्च नहीं उठा सकते और प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते।’’

स्यालोदड़ा की लगभग 50 वर्ष की अनुसूचित जाति की महिला प्रेम देवी इसका उदाहरण हैं। बेटे की मदद से उन्होंने पिछले तीन वर्षों में तीन बार पोर्टल पर पंजीकरण कराया, लेकिन हर बार उनका पंजीकरण रद्द कर दिया गया।

वह कहती हैं, ‘‘पंजीकरण के बाद अस्पताल जाकर फेफड़ों का एक्स-रे कराना पड़ता है। फिर एक्स-रे जांच के लिए डॉक्टर को भेजा जाता है और उसके आधार पर प्रमाणपत्र मिलता है। हमें यह पता ही नहीं चलता कि डॉक्टर कौन है या उसका कार्यालय कहां है। हर बार जब मेरा एक्स-रे जांच के लिए गया, मेरा पंजीकरण रद्द कर दिया गया।’’

मीणा के अनुसार, प्रमाणपत्र मिलने पर मरीजों को मुफ्त दवाएं, हर महीने 5,000 रुपये और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।

ऑक्सीजन की जरूरत पड़ने पर यह आर्थिक सहायता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। स्यालोदड़ा के ग्रामीणों के मुताबिक, एक ऑक्सीजन सिलेंडर करीब 1,000 रुपये का पड़ता है। मौत से पहले मंजीत को एक दिन में 12 सिलेंडर तक की जरूरत पड़ती थी।

समस्या केवल स्यालोदड़ा तक सीमित नहीं है। कोटपूतली-बहरोड़ के खनन प्रभावित जोधपुरा-मोहनपुरा गांव में भी लोग ऐसी ही परेशानियों से जूझ रहे हैं।

जोधपुरा संघर्ष समिति के सचिव कैलाश यादव बताते हैं कि गांव के ज्यादातर लोगों को सांस लेने में परेशानी है। गांव की पहाड़ी पर बने मंदिर के पास ही अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड की खनन साइट है। वहां जेसीबी मशीनें पत्थर खोदती हैं और डंपर उन्हें पास की ‘क्रशर’ इकाई तक ले जाते हैं।

यादव के मुताबिक, चट्टानों को तोड़ने के लिए यहां अक्सर रात में भी विस्फोट किए जाते हैं।

अप्रैल 2023 में ‘नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट’ (एनएपीएम) और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने गांव के करीब 928 लोगों का सर्वेक्षण किया था। इनमें 478 लोगों ने त्वचा रोग, सांस की परेशानी, टीबी और आंखों में खुजली जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं बताईं।

दोनों संगठनों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ये बीमारियां ‘‘विस्फोट से उड़ने वाली धूल के कारण’’ हो सकती हैं और इस पर आगे जांच की जरूरत है।

खनन से गांव पर पड़ रहे गंभीर प्रभावों को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की मध्य जोन की पीठ ने पिछले नवंबर में राजस्थान सरकार को पूरे गांव के पुनर्वास के लिए समिति बनाने का आदेश दिया था।

इसके बावजूद गांव के लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ है और खनन गतिविधियों को रोकने के लिए भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

अरावली विरासत जन अभियान के अनुसार, अरावली समिति ने छह से 11 अगस्त के बीच दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के नौ जिलों का दौरा किया। गुरुग्राम, अलवर, अजमेर और उदयपुर में जनसुनवाई भी हुई।

भारतीय वन सर्वेक्षण की 2025 की रिपोर्ट में गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 63 जिलों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा बताया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने समिति को अंतिम रिपोर्ट 30 नवंबर तक दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘अरावली के मुद्दे पर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समिति दिन-रात काम करे।’’

लेकिन कैलाश यादव को भरोसा नहीं है कि अंतिम रिपोर्ट सौंपने से पहले समिति जोधपुरा-मोहनपुरा आएगी।

भाषा गोला रंजन

रंजन