आज के समय में बच्चों के संसार में दादा दादी नहीं होते । संस्कारों की नींव नहीं पड़ती । रिश्तों की गरमाहट किसी लॉक अप में बंद है । बच्चों के हाथ में मोबाइल ,रिमोट , कम्प्युटर और उसी माहौल के पले बढे दोस्त होते हैं । दादा दादी से उनका कोई भावुक रिश्ता नहीं बन पाता । जब यही बच्चे बड़े -बालिग़ हो जाते हैं तो उनकी दुनिया और आधुनिक हो जाती है । तब माता पिता के साथ उनका भावुक रिश्ता नहीं रहता । इस तरह तीन पीढ़ियाँ अपने अपने दुःख सुख के साथ दिन काट रहीं हैं । इन पीढ़ियों को जोड़ती थी हमारी अपनी बोलियाँ । बघेली,बुन्देली,मालवी,अवधी,बृज,हाड़ौती, भोजपुरी,मैथिली,गोंडी ,कोरकू और न जाने कितनी बोलियाँ सदियों से कानों में मिसरी घोलतीं थीं, पर जैसे उन्हें अनपढ़ और गँवार होने का अभिशाप दे दिया.
आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है जो हमें फिर से एक बार सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि कहाँ खो रही है हमारी बोलियों की मिठास ,एक ज़माना था जब कहा जाता था कि बच्चों का रिश्ता अपने माता पिता से ज़्यादा दादा -दादी या नाना नानी से होता है । लेकिन अब तस्वीर बदल गई है । दादी या नानी अपने नाती पोतों से बातें करना तो चाहतीं हैं लेकिन अफसोस कि अब बच्चों को उनकी बोलियां और भावुक अभिव्यक्तियों के प्रतीक समझ नहीं आते ?
परिवार के फासला बढ़ता जा रहा है लोग घर पर कम बात करते हैं इसलिए बोलियाँ नई नस्लों तक नहीं पहुँच रहीं हैं। इसके गंभीर परिणामों पर हमने नहीं सोचा है । आप खुद गौर करें कि जब हम संयुक्त परिवारों की ख़ुशनुमा यादें अपने बच्चों के साथ बाँटते हैं तो वो इतनी हैरानी से सुनते हैं मानो हम किसी दूसरे लोक की कथाएँ सुना रहे हैं. अब समय आ गया है कि हम फिर से एक बार अपने बच्चों को परिवार से जोड़े अपनी भाषा अपनी बोली के करीब लाये तभी सार्थक होगी अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की परिकल्पना जिसका उद्देश्य था कि विश्व में भाषाई एवँ सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले और लोग एक दूसरे की भाषा से परिचित होये लेकिन ये तभी संभव है जब हम अपनी भाषा से भली भांति परिचति होंगे।
रेणु नंदी IBC24