नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को 25 साल पुराने हत्या के एक मामले में चार व्यक्तियों की दोषसिद्धि और उन्हें सुनाई गई उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों में ‘‘काफी कमियां’’ हैं, जिससे कथित अपराध में उनकी संलिप्तता को लेकर उचित संदेह पैदा होता है।
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने ओडिशा उच्च न्यायालय के मई 2009 के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर अपना निर्णय सुनाया, जिसमें इस मामले में छह व्यक्तियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषी ठहराए गए छह व्यक्तियों ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए उसके समक्ष अपील दायर की थी।
अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया कि अपील लंबित रहने के दौरान उनमें से दो व्यक्तियों का निधन हो गया, जिसके परिणामस्वरूप उनके संबंध में अपील स्वतः ही समाप्त हो गई।
पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि चिकित्सीय सबूतों से यह साफ हो गया था कि व्यक्ति की मौत हत्या के कारण हुई थी, लेकिन हमारे सामने सवाल यह है कि क्या अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि अपराध अपीलकर्ताओं ने ही किया था; और हमें लगता है कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में नाकाम रहा…।’’
इसने कहा कि यह मामला मुख्य रूप से कुछ कथित चश्मदीदों के बयानों पर आधारित था।
पीठ ने कहा कि उनमें से कुछ के बयानों से अभियोजन पक्ष के मामले में काफी विरोधाभास पैदा हुआ।
न्यायालय ने कहा कि गवाहों के बयानों से यह साफ था कि घटना घोर अंधेरी रात में हुई थी।
इसने कहा कि कथित चश्मदीद गवाहों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि एक बार जब कथित चश्मदीद गवाहों के बयानों को खारिज कर दिया जाता है, तो अभियोजन पक्ष का मामला अनिवार्य रूप से केवल परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित रह जाता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए, हर परिस्थिति को संदेह से परे साबित किया जाना चाहिए और सभी परिस्थितियां मिलकर आरोपी के अपराध की ओर इशारा करती हों।
भाषा सुरेश नेत्रपाल
नेत्रपाल