मोदी सरकार ने एनजीटी को ‘कमजोर’ कर दिया : कांग्रेस नेता जयराम रमेश

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मोदी सरकार ने एनजीटी को ‘कमजोर’ कर दिया : कांग्रेस नेता जयराम रमेश

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  • Publish Date - September 20, 2026 / 06:47 PM IST,
    Updated On - September 20, 2026 / 06:47 PM IST

नयी दिल्ली, 20 सितंबर (भाषा) कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मोदी सरकार पर पिछले एक दशक में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को “कमजोर” करने का रविवार को आरोप लगाया। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि इस साल के पहले छह महीनों में गुण-दोष के आधार पर सुनी गई किसी भी अपील में एनजीटी ने पर्यावरण या जनहित से जुड़े पक्ष के हक में फैसला नहीं दिया।

पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि अब एनजीटी को उस ‘एनजीटी कानून’ की मूल भावना और उद्देश्य का फिर से पता लगाना चाहिए, जिसके तहत दो जून 2010 को उसका गठन हुआ था।

रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “साउथ एशियन रिपोर्टर फॉर एनवायरनमेंट लॉज (एसएआरईएल) की ओर से 19 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि 2026 के पहले छह महीनों के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने गुण-दोष के आधार पर सुनी गई किसी भी अपील में पर्यावरण या जनहित से जुड़े पक्ष के हक में फैसला नहीं दिया।”

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 में जनवरी से जून के बीच एनजीटी की पांच पीठों के समक्ष 119 अपील दायर की गईं और इनमें से 52 को प्रक्रियागत आधार पर खारिज कर दिया गया, जो अपने आप में सवाल खड़े करता है।

रमेश ने कहा, “गुण-दोष के आधार पर सुनी गई 67 अपील में से 51 उद्योगों, परियोजना समर्थकों या संपत्ति मालिकों की ओर से दायर की गई थीं। इनमें से 30 मामलों में, यानी करीब 60 फीसदी अपील में, उन्हें अनुकूल आदेश मिले। इसके विपरीत, पर्यावरण या जनहित से जुड़े पक्षों ने पर्यावरणीय न्याय की मांग को लेकर 16 अपील दायर कीं। इन सभी अपील को खारिज कर दिया गया और किसी को भी अनुकूल फैसला नहीं मिला।”

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि एनजीटी की स्थापना जून 2010 में संसद की ओर से पारित एक कानून के जरिये देश के नागरिकों को प्रभावी और त्वरित पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी।

रमेश ने कहा, “पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने इसे (एनजीटी) कमजोर कर दिया है, लेकिन एनजीटी को अपनी हिम्मत फिर से हासिल करनी होगी और अपनी मूल भावना को फिर से तलाशना होगा।”

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि भारतीय अदालतों को संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना चाहिए।

इसी बीच, एक विश्लेषण में सामने आया कि वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में एनजीटी ने गुण-दोष के आधार पर सुनवाई के दौरान पर्यावरणीय न्याय या जनहित से जुड़ी एक भी अपील में संबंधित पक्ष के हक में फैसला नहीं दिया।

वहीं, परियोजना समर्थक, संपत्ति मालिक या उद्योग पक्ष ने जब अपनी गुण-दोष आधारित अपील दायर कीं, तो उनकी सफलता दर 58.8 प्रतिशत रही।

एसएआरईएल की ओर से किए गए इस विश्लेषण में जनवरी से जून के बीच एनजीटी की पांच पीठों के समक्ष दायर 119 अपील का अध्ययन किया गया। इनमें से 16 गुण-दोष आधारित अपील पर्यावरण या जनहित से जुड़े पक्षों ने दायर की थीं, जबकि 51 ऐसी अपील परियोजना समर्थकों, संपत्ति मालिकों या उद्योग पक्ष की ओर से दायर की गई थीं।

पचास से अधिक अपील को तकनीकी या प्रक्रियागत आधार पर खारिज कर दिया गया और उनकी गुण-दोष के आधार पर कभी सुनवाई ही नहीं हो सकी।

विश्लेषण में कहा गया, ‘‘जनहित से जुड़े पक्ष को उसके सभी 16 मामलों में कोई अनुकूल फैसला नहीं मिला और वह एक भी मामला नहीं जीत सका। उद्योग पक्ष की केवल करीब एक-तिहाई अपील ही खारिज हुईं और उसे 59 प्रतिशत मामलों में अनुकूल आदेश (51 में से 30 गुण-दोष आधारित अपील में जीत) मिला। इसके अलावा, छह प्रतिशत मामलों में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया।’’

विश्लेषण में कहा गया कि तकनीकी आधार पर खारिज किया जाना एक बड़ा अवरोध रहा, क्योंकि कुल अपील में से 44 प्रतिशत को कानूनी समय-सीमा, अधिकार क्षेत्र, विचारणीय होने या वापस लिए जाने के आधार पर बिना गुण-दोष के फैसले के ही खारिज कर दिया गया।

भाषा संतोष पारुल

पारुल