नयी दिल्ली, 27 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 15 वर्षीय एक किशोरी को 28 हफ्ते से अधिक का गर्भ चिकित्सकीय देखरेख में खत्म करने की अनुमति देते हुए कहा कि माता की प्रजनन स्वायत्तता को अवश्य ही सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब अनचाहे गर्भ को खत्म करने के लिए संवैधानिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाता है, तो उन्हें रोकने का तरीका नहीं अपनाना चाहिए।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने कहा कि गर्भवती महिला की इच्छा, अजन्मे बच्चे की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की गर्भावस्था जारी रहने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षिक संभावनाओं, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर दीर्घकालिक परिणाम पड़ सकते हैं।
न्यायालय ने कहा कि महिला की प्रजनन स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए और यदि किसी महिला को अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसके संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा।
पीठ ने कहा, ‘‘अपने शरीर से संबंधित, विशेष रूप से प्रजनन संबंधी मामलों में, निर्णय लेने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न अंग है। इस अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध लगाकर निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता, विशेषकर नाबालिगों और अनचाही गर्भावस्थाओं से जुड़े मामलों में, जैसा कि इस मामले में है।’’
न्यायालय ने 24 अप्रैल को पारित आदेश में कहा, ‘‘किसी भी अदालत को किसी महिला, विशेषकर नाबालिग लड़की को, उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था को पूर्ण अवधि तक जारी रखने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। इस प्रकार की बाध्यता न केवल उसके निर्णय लेने की स्वायत्तता का हनन करेगी, बल्कि जन्म देने के लिए मजबूर किए जाने की स्थिति में उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंचा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों में, राहत से इनकार करने से नाबालिग को अपरिवर्तनीय परिणामों का सामना करना पड़ेगा और ऐसा दृष्टिकोण प्रजनन संबंधी विकल्प को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने वाले संवैधानिक और स्थापित सिद्धांतों के विपरीत होगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में नाबालिग की उम्र 15 वर्ष है और गर्भावस्था अवांछित है तथा गर्भावस्था को जारी रखना गर्भवती नाबालिग के हित में नहीं है, खासकर जब उसने दो बार आत्महत्या करने का प्रयास किया है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘इन परिस्थितियों में, हम निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता की बेटी (नाबालिग) को चिकित्सकीय देखरेख में गर्भ खत्म करने की अनुमति दी जाए।’’
भाषा सुभाष माधव
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