मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एआईएमपीएलबी के अभियान को ‘ध्रुवीकरण के लिए राजनीतिक उपहार’ बताया

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मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एआईएमपीएलबी के अभियान को ‘ध्रुवीकरण के लिए राजनीतिक उपहार’ बताया

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  • Publish Date - September 22, 2026 / 07:44 PM IST,
    Updated On - September 22, 2026 / 07:44 PM IST

नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) मुस्लिम कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के “सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान का कड़ा विरोध करते हुए इसे ‘ध्रुवीकरण के लिए राजनीतिक उपहार” बताया।

उन्होंने यहां जारी एक संयुक्त बयान में अभियान की आलोचना करते हुए यह भी कहा कि कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बोर्ड की यह मुहिम इन आरोपों को मजबूत करेगी कि भारतीय मुसलमान देश के कानून को नहीं मानते।

इसमें कहा गया है कि एआईएमपीएलबी का यह अभियान अनजाने में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को खुद को संवैधानिक मूल्यों का रक्षक बताने का अवसर देता है।

बयान में मुस्लिम धर्म गुरुओं पर अपने समुदाय की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान नहीं देने का आरोप लगाते हुए कहा गया है कि एआईएमपीएलबी की प्राथमिकता ‘शरीयत बचाना’ है, जबकि भारतीय मुसलमानों के सामने मौजूद सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार जैसी वास्तविक चुनौतियां हैं जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।

बयान पर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की सह-संयोजक जकिया सोमन, मुस्लिम फॉर प्रोग्रेसिव वैल्यूज़ (एमपीवी) की अध्यक्ष एनी ज़ोनवेल्ड, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, उनकी पत्नी एवं अभिनेत्री रत्ना पाठक, अभिनेता-निर्देशक अमोल पालेकर, वृत्तचित्र फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन, महात्मा गांधी के पड़पौत्र तुषार गांधी ने हस्ताक्षर किए हैं।

इसके अलावा सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अशोक धीवरे, शास्त्रीय नृत्यांगना एवं अभिनेत्री मल्लिका साराभाई, लेखक कार्यकर्ता राम पुनियानी, लेखक हिलाल अहमद, प्रोफेसर राधा कुमार, कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड, पत्रकार अस्करी जैदी और पूर्व विधायक बदर सईद समेत राजनीतिक व सामाजिक जगत की कुल 92 हस्तियों के हस्ताक्षर हैं।

बयान में लैंगिक न्याय पर आधारित और धार्मिक रूप से भेदभाव रहित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की मांग करते हुए एआईएमपीएलबी पर संवैधानिक प्रावधानों का चुनिंदा ढंग से इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है। बयान में कहा गया है कि संविधान के अन्य प्रावधान कानून के समक्ष समानता और धर्म या लैंगिक आधार पर भेदभाव पर रोक की गारंटी देते हैं।

बयान के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया और मोरक्को जैसे कई मुस्लिम-बहुल देशों ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने व्यक्तिगत कानूनों को संहिताबद्ध और संशोधित किया है।

इसमें कहा गया है, “इसी तरह लाखों मुसलमान ऐसे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों में रहते हैं जहां समान पारिवारिक कानून लागू हैं और इससे इस्लाम को कोई खतरा नहीं हुआ।”

बयान में कहा गया है कि भारत में मुस्लिम समुदाय की मौजूदा कानूनी स्थिति के लिए एआईएमपीएलबी और रूढ़िवादी नेतृत्व की यह विफलता जिम्मेदार है कि उन्होंने समय रहते मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार नहीं किया।

बयान में कहा गया है, “जहां मुख्यधारा के राजनीतिक दल अक्सर मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों की अनदेखी करते हैं, वहीं हिंदुत्ववादी ताकतें समान नागरिक संहिता की बहस का इस्तेमाल राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए करती हैं।”

बयान के अनुसार वास्तविक पारिवारिक कानून सुधार में मुस्लिम महिलाओं को विवाह की न्यूनतम आयु, बहुविवाह की समाप्ति, आपसी सहमति से तलाक, समान उत्तराधिकार अधिकार, बच्चों का संरक्षण, गोद लेने के अधिकार तथा हलाला पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर समान अधिकार मिलने चाहिए।

बयान में कहा गया है कि जहां धर्मनिरपेक्ष दल मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का पर्याप्त समर्थन नहीं करते, वहीं भाजपा और हिंदुत्ववादी संगठन ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से करते हैं।

बयान के अनुसार आरएसएस मुस्लिम महिलाओं के प्रति सहानुभूति दिखाता है, लेकिन ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ जैसे नारों, भीड़ हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई, मस्जिदों को तोड़ने और आर्थिक बहिष्कार जैसी घटनाओं पर चुप रहता है।

भाषा नोमान नोमान अविनाश

अविनाश