नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंगलवार को ‘थर्ड पार्टी’ बीमा कवर के बिना बड़ी संख्या में चल रहे वाहनों पर गंभीर चिंता जताई और केंद्र सरकार को एक प्रायोगिक परियोजना तैयार करने का निर्देश दिया, जिसके तहत वैध बीमा नहीं होने पर पेट्रोल पंपों पर ऐसे वाहनों को ईंधन देने से इनकार किया जा सके।
शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और टोल प्लाजा पर लंबी कतारों के प्रभाव पर भी ध्यान दिया तथा केंद्र को कुछ चुनिंदा गलियारों में ऐसी प्रायोगिक परियोजनाएं लागू करने का निर्देश दिया, जिनके तहत टोल प्लाजा पर वाहनों को रोकने के बजाय टोल बिंदुओं से गुजरने वाले वाहनों की स्वचालित पहचान की व्यवस्था की जाए।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के उन प्रावधानों का पर्याप्त पालन नहीं हो रहा है, जिनके तहत सभी वाहनों के लिए ‘थर्ड पार्टी’ जोखिम को कवर करने वाला वैध बीमा अनिवार्य है। पीठ ने कहा कि वित्त संबंधी स्थायी समिति की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सड़कों पर चल रहे लगभग 56 प्रतिशत वाहन बिना बीमा के हैं, जो अत्यंत चिंताजनक है।
पीठ ने कहा, ‘अदालत में हुई चर्चा के अनुसार भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (एमओआरटीएच) के साथ विचार-विमर्श करके ऐसी प्रायोगिक परियोजना तैयार करे, जिसके तहत वाहनों को ईंधन दिए जाने को उनके वैध बीमा की स्थिति से जोड़ा जाए। वैध बीमा नहीं होने की स्थिति में संबंधित वाहन को तब तक पेट्रोल पंप पर ईंधन नहीं दिया जाएगा, जब तक वह वैध बीमा नहीं करा लेता।’
शीर्ष अदालत ने कहा कि ईंधन नहीं देने की व्यवस्था से दोहरे लाभ होंगे। उसने कहा कि इससे बिना बीमा या बिना पंजीकरण वाले वाहनों की पहचान करने में मदद मिलेगी और वाहन मालिकों को वैध बीमा कराने के लिए भी प्रेरित किया जा सकेगा।
पीठ ने कहा, ‘ऐसी परियोजनाएं मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के वैधानिक प्रावधानों का जमीनी स्तर पर अनुपालन सुनिश्चित करेंगी। इसके लिए एएनपीआर (स्वचालित नंबर प्लेट पहचान) कैमरों का उपयोग किया जा सकता है।’ अदालत ने यह भी कहा कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को भी सिद्धांततः इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि 2018 में उसने नये चारपहिया वाहनों के लिए खरीद या पंजीकरण के समय तीन वर्ष तथा दोपहिया वाहनों के लिए पांच वर्ष की ‘थर्ड पार्टी’ बीमा पॉलिसी लेना अनिवार्य किया था।
अदालत ने कहा, ‘हम देखते हैं कि उस निर्देश के आठ वर्ष बाद भी बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के हैं। हालांकि आईआरडीए और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (जीआईसी) ने इस अवधि को न बढ़ाने की सिफारिश की है, लेकिन हमारा मत है कि सड़क सुरक्षा के हित में इस अवधि को एक वर्ष बढ़ाया जाना चाहिए।’
पीठ ने निर्देश दिया, ‘इसलिए अब से नए चारपहिया वाहनों के लिए चार वर्ष तथा नये दोपहिया वाहनों के लिए छह वर्ष की ‘थर्ड पार्टी’ बीमा पॉलिसी खरीदना अनिवार्य होगा। आईआरडीए तत्काल आवश्यक निर्देश जारी करे।’
अदालत ने कहा कि 30.48 करोड़ वाहनों में से 16.54 करोड़ वाहन बिना बीमा के हैं। उसने कहा कि इसका परिणाम यह होता है कि दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा देने का वैधानिक संरक्षण या तो विलंबित हो जाता है या कई मामलों में निष्प्रभावी हो जाता है।
पीठ ने कहा, ‘मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत अनिवार्य बीमा का उद्देश्य केवल सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा दिलाना नहीं है, बल्कि उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई से भी बचाना है।’ अदालत ने कहा कि बिना बीमा वाले वाहनों के कारण दुर्घटना पीड़ितों और उनके परिवारों को उचित समय में पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को मुआवजे की राशि और दायित्व तय करने के लिए लंबी मुकदमेबाजी करनी पड़ती है। उसने कहा कि यदि दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाती है या वह स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है तो उसके परिवार पर आर्थिक बोझ और अधिक बढ़ जाता है।
न्यायालय ने न्यायहित में आईआरडीए और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे कुछ राज्यों में बीमा सूचना ब्यूरो और ‘वाहन’ पोर्टल के आंकड़ों से जुड़े एएनपीआर कैमरे लगाएं, ताकि बिना बीमा वाले वाहनों के लिए स्वत: ई-चालान जारी किए जा सकें।
अदालत ने कहा कि फिलहाल राज्य पुलिस के पास मौके पर बीमा की स्थिति जांचने की कोई समान व्यवस्था नहीं है। उसने कहा कि इसलिए राज्य पुलिस को बीमा सूचना ब्यूरो और ‘वाहन’ पोर्टल से जुड़े हैंडहेल्ड उपकरण या डाउनलोड किए जा सकने वाले ऐप उपलब्ध कराए जाएं।
पीठ ने कहा, ‘इससे वाहनों के बीमा की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकेगी और उल्लंघन की स्थिति में चालान जारी करके अनिवार्य बीमा का जमीनी स्तर पर अनुपालन सुनिश्चित किया जा सकेगा।’ अदालत ने वैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को भी कहा।
अदालत ने आईआरडीए को यह भी निर्देश दिया कि वह निजी वाहन मालिकों के लिए मोटर वाहन अधिनियम के तहत निर्धारित न्यूनतम कवरेज वाली मूल पॉलिसी के साथ-साथ ऐड-ऑन, व्यक्तिगत दुर्घटना कवर और स्वयं के वाहन की क्षति कवर जैसी विभिन्न पॉलिसी विकल्प भी उपलब्ध कराए।
मोटर दुर्घटना दावा मामले में कई निर्देश जारी करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत में सड़क सुरक्षा की यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है कि ‘थर्ड पार्टी’ मोटर बीमा को अनिवार्य बनाने वाला वैधानिक ढांचा होने के बावजूद उसका पर्याप्त अनुपालन नहीं हो रहा है।
अदालत ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाओं से प्रभावित लोगों या उनके परिजनों को मुआवजा पाने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
भाषा अमित पवनेश
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