(तस्वीरों के साथ)
मैसूरु (कर्नाटक), 12 जुलाई (भाषा) दिग्गज पार्श्व गायिका एस जानकी का रविवार शाम को यहां कनियानहुंडी स्थित उनके फार्म हाउस पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
उनका सांस की तकलीफ के कारण शनिवार शाम को एक निजी अस्पताल में 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार की घोषणा के अनुसार, पुलिस की एक टुकड़ी ने राष्ट्रगान की धुन के बीच उन्हें बंदूकों की सलामी दी।
एस जानकी की पोती अप्सरा वैद्युला ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अपनी दादी की चिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं।
उन्होंने हाथ में मिट्टी का घड़ा लेकर जलती हुई चिता की परिक्रमा की। पुरुषों तक ही सीमित रहने वाली रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ते हुए अप्सरा ने इन सभी अंतिम रस्मों को पूरा किया।
अप्सरा वैद्युला, जानकी के बेटे मुरली कृष्ण की बेटी हैं, जिनका इसी वर्ष 22 जनवरी को निधन हो गया था।
इससे पहले, जानकी के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए महाराजा कॉलेज मैदान में रखा गया था, जहां कन्नड़ और दक्षिण भारतीय सिनेमा जगत के कई अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और पार्श्व गायकों सहित हजारों आम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
राज्य सरकार की ओर से मैसूरु जिले के प्रभारी मंत्री यतींद्र सिद्धरमैया भी दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री शिवकुमार ने बेंगलुरु में संवाददाताओं से संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी सरकार जानकी की विरासत को अमर बनाने के तरीकों पर विचार करेगी। उन्होंने जानकी को भारत के संगीत जगत की महानतम विभूतियों में से एक बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि वह उनकी इस संगीत विरासत को संजोने के उपायों पर फिल्म उद्योग के सदस्यों के साथ चर्चा करेंगे।
शिवकुमार ने कहा, ‘भारत की सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों में से एक और ‘गाना कोगिले’ (कोकिला) के नाम से मशहूर दिग्गज पार्श्व गायिका जानकी अब हमारे बीच नहीं रहीं। उन्होंने लगभग 50 वर्षों तक सभी भाषाओं में हमारे फिल्म उद्योग की सेवा की।’
जानकी का जन्म 23 अप्रैल 1938 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर स्थित पल्लापटला में हुआ था, लेकिन बाद में उन्होंने मैसूरु को अपना घर बना लिया था। उनकी इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार इसी शाही शहर में किया गया।
अपनी बहुमुखी गायकी के लिए मशहूर जानकी ने कई भाषाओं में 48,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए, जिनमें मुख्य रूप से कन्नड़, तमिल, तेलुगु और मलयालम जैसी दक्षिण भारतीय भाषाएं शामिल हैं। छह दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने हिंदी, ओडिया, तुलु, उर्दू, पंजाबी और बंगाली सहित लगभग 20 भारतीय भाषाओं में फिल्मों, एल्बमों, टेलीविजन और रेडियो के लिए गाने गाए।
अपने शिष्यों और प्रशंसकों के बीच ‘जानकी अम्मा’ के नाम से लोकप्रिय संगीत साधिका को ‘गाना कोगिले’ (कोकिला) का दर्जा प्राप्त था। जानकी ने अपने गायन करियर की शुरुआत 19 वर्ष की आयु में तमिल फिल्म ‘विधियिन विलायट्टू’ (1957) से की थी।
यद्यपि वह अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी बेहद लोकप्रिय थीं, लेकिन माना जाता है कि जानकी ने अपने करियर में सबसे अधिक गाने कन्नड़ भाषा में गाए।
पी बी श्रीनिवास, एस पी बालासुब्रमण्यम और डॉ. राजकुमार जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ गाए गए उनके युगल गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं। उन्होंने अंग्रेजी, जापानी, जर्मन और सिंहली भाषाओं के गीतों को भी अपनी आवाज दी।
जानकी ने चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और विभिन्न राज्यों के 33 राज्य फिल्म पुरस्कार जीते थे। उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट, तमिलनाडु सरकार से कलाईमामणि पुरस्कार और कर्नाटक सरकार से राज्योत्सव प्रशस्ति भी प्राप्त हुई थी।
वर्ष 2013 में उन्होंने भारत सरकार के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ को यह कहते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया था कि यह सम्मान उन्हें बहुत देर से दिया गया।
जानकी ने यह इच्छा भी व्यक्त की थी कि संगीत में उनके योगदान के लिए वह देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ की हकदार हैं।
वर्ष 1997 में अपने पति वी रामप्रसाद के निधन के बाद से सफेद या सादा रंगों के कपड़े और एक सरल व शालीन शैली लंबे समय तक उनकी पहचान बनी रही।
भाषा सुमित नरेश
नरेश